अपनी ढपली अपना राग

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Posted by: Firsteye Desk, Updated: 08/11/19 12:34:29pm


अमेरिका अब पेरिस जलवायु समझौते से बाकायदा अलग होने जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र को उसने आधिकारिक तौर पर इस एग्रीमेंट से बाहर आने की सूचना दे दी है। इसके साथ ही समझौते से उसके बाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू होगी, जो एक साल लंबी है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। पेरिस जलवायु समझौता 12 दिसंबर 2015 को हुआ था। पूर्व अमेरिकी प्रेजिडेंट बराक ओबामा इसके बड़े पैरोकारों में थे, जबकि डॉनल्ड ट्रंप शुरू से ही इसके विरोधी रहे हैं। इस समझौते से हटना उनके चुनावी वादों में एक था।

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ट्रंप की दलील है कि पेरिस समझौता एकतरफा है। इसके तहत अमेरिका खरबों डॉलर खर्च कर रहा है, जबकि रूस, चीन और भारत जैसे प्रदूषण फैलाने वाले देश कुछ नहीं दे रहे हैं। जून 2017 में ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौता न मानने की घोषणा करके दुनिया को चौंका दिया था। कई देशों ने उनसे अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया पर उन्हें निराशा मिली। वहां से आगे बढ़कर औपचारिक रूप से समझौते से अलग होने का फैसला अमेरिका ने ऐसे समय किया है, जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को लेकर चिंतित है। हाल में इस संबंध में आए अध्ययनों का स्पष्ट इशारा है कि जल्द ही कार्बन उत्सर्जन रोकने के गंभीर उपाय नहीं किए गए तो दुनिया के कई हिस्सों को भयावह संकट का सामना करना पड़ सकता है। दुर्भाग्य यह कि ट्रंप जैसे ताकतवर लोगों को इसकी जरा भी परवाह नहीं है। वे बस तात्कालिकता में जी रहे हैं और अपने निजी हानि-लाभ देख रहे हैं। अमेरिका में जल्द ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है और अपनी जीत के लिए ट्रंप कोयला खदानों वाले इलाकों को आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। कुछ साल पहले इनके बंद होने से लोग बेरोजगार होने लगे थे। पिछले चुनाव में ट्रंप अमेरिका फर्स्ट के नारे के बल पर चुने गए और उन इलाकों में बेरोजगारी घटाने की कोशिश की। अभी कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए खदानें बंद करने की नौबत आती तो उन क्षेत्रों में ट्रंप का विरोध हो सकता था।

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 बहरहाल, दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और संसार के दूसरे सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देश के पेरिस समझौते से हटने के चलते जलवायु परिवर्तन पर काबू पाने की मुहिम कमजोर पड़ेगी, इस बात का अहसास कई अमेरिकी राजनेताओं को भी है। विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने समझौते से अलग होने के ट्रंप के निर्णय की कड़ी आलोचना की है। अमेरिका में पर्यावरण से जुड़े कुछ ट्रस्टों ने भी इस फैसले को गलत बताया है और यहां तक कहा है कि इसकी वजह से ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव हार सकते हैं। ऐसा हो या न हो मगर वैश्विक मंचों पर अमेरिका की भूमिका इससे जरूर प्रभावित होगी। रास्ता एक ही है। वह यह कि बाकी देश इस समझौते पर मजबूती से एकजुट होकर जलवायु परिवर्तन से निपटने की मुहिम तेज करें और आम अमेरिकियों का मन बदलने का इंतजार करें।

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