अयोध्या पर फैसला

अयोध्या पर फैसला

अयोध्या पर फैसला

Posted by: Firsteye Desk, Updated: 21/10/19 03:43:34pm


भारत के मर्म को उद्वेलित करने वाले सदियों पुराने अयोध्या विवाद में आखिर फैसले की घड़ी आ ही गई। समझौते के प्रयासों, मध्यस्थों की बातचीत व उच्च न्यायालय की कोशिशों के बावजूद जब सदियों पुराने विवाद में कोई समाधान होता नजर नहीं आया तो आखिरकार सुप्रीमकोर्ट ने इस दिशा में गंभीर पहल की। लगातार चालीस दिन सुनवाई के बाद आस जगी है कि इस चिर प्रतीक्षित मामले में एक माह के भीतर फैसला आ जायेगा। उम्मीद की वजह यह है कि सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई सत्रह नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। दरअसल, यह महज एक भूखंड का विवाद नहीं है, इससे करोड़ों लोगों की आस्था भी जुड़ी है। आमतौर पर आस्था से जुड़े संवेदनशील विषयों पर अदालतों को फैसला देना आसान नहीं होता, मगर इस मामले में कई साक्ष्य भी उपलब्ध हैं, जिसमें पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट भी शामिल है। यहां यह जरूरी है कि जब भी, जो भी फैसला आये, उसे देश सिर-माथे पर लगाये। इस विवाद को लेकर देश ने बड़ी कीमत चुकाई है और तमाम कोशिशों के बावजूद कोई समाधान नहीं निकल पाया।

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संभावित फैसले को लेकर हार-जीत की दावेदारी के बजाय सुप्रीमकोर्ट के फैसले का सम्मान सभी पक्षों को करना होगा। यह जानते हुए कि देश में सौहार्द व शांति पहली प्राथमिकता है। हमें पूरी दुनिया को यह संदेश? भी देना है कि हम एक परिपक्व राष्ट्र के रूप में व्यवहार करते हैं। यदि कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है तो असामाजिक तत्व उसका फायदा उठा सकते हैं। राजनीतिक दल भी अपनी सुविधा से उपजे हालात की व्याख्या कर सकते हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि पिछले तीन दशक में इस विवाद के चलते देश को जो क्षति हुई, उसकी पुनरावृत्ति न होने पाये। हमें दुनिया को यह संदेश देना होगा कि हम तमाम मतभेदों के बावजूद मनभेद में विश्वास नहीं रखते। वैसे तो बेहतर होता कि दोनों पक्षों द्वारा विवाद से जुड़े मुद्दों को आपस में सुलझा लिया जाता और इसे वर्ग विशेष की प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाया जाता। सुनवाई से पहले भी शीर्ष अदालत ने समस्या के समाधान के लिये मध्यस्थ पैनल भी नियुक्त किया था। मगर पैनल किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में नाकामयाब रहा। दरअसल, इस विवाद को अस्मिताओं से जोडऩे और मानसिकता का हिस्सा बन जाने से मुद्दा बेहद संवेदनशील बन गया है। ऐसे में जो भी फैसला आये, उसका सम्मान होना चाहिए। उसे किसी की जीत व किसी की हार के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो पड़ोस में भारत विरोधी ताकतें इस मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगी। साथ ही हमारे राजनेताओं को भी इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। अतीत गवाह है कि मामले के राजनीतिक विवाद में फंसने के चलते देश ने इसकी बड़ी कीमत चुकायी है। ऐसे में पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ जो भी फैसला सुनाए, विवाद से जुड़े तीनों पक्ष उसे सम्मान दें। उनके बयानों व विचारों में संयम व गरिमा का भाव होना चाहिए। 

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देश पहले ही विकास और कानून व्यवस्था से जुड़ी तमाम चुनौतियों से जूझ रहा है, उसमें वृद्धि करने का कदम प्रतिगामी ही होगा। इस मामले में अयोध्या मामले से जुड़े पक्षों की जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि यह मामला सामाजिक संवेदनशीलता की दृष्टि से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि हम ऐसा कर पाये तो दुनिया में गंगा-जमुनी संस्कृति के पोषक राष्ट्र के रूप में हमारी पहचान बनेगी। यह वक्त की जरूरत भी है। नि:संदेह अयोध्या मामले में दलीलें खत्म होने के बाद उम्मीदें बांधने का समय आ चुका है। ऐसे में आशा की जा सकती है कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगाई अपनी न्यायिक पारी का समापन देश के बहुचर्चित-बहुप्रतीक्षित मामले को सार्थक परिणति देने के साथ?करेंगे।
 

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