मर्यादा की सीमा लांघती जुमलों की राजनीति

मर्यादा की सीमा लांघती जुमलों की राजनीति

मर्यादा की सीमा लांघती जुमलों की राजनीति

Posted by: Firsteye Desk, Updated: 22/10/19 02:05:30pm


विश्वनाथ सचदेव
कमान से निकला हुआ तीर और ज़बान से निकला हुआ शब्द वापस नहीं आता, यह एक मुहावरा है। मुहावरा यानी प्रभावशाली ढंग से बात कहने का एक ढंग, जो समाज न जाने कब से काम में लेता रहा है। सामान्य बोलचाल और साहित्य, दोनों में मुहावरेदार भाषा को एक विशेषता के रूप में ही देखा जाता है और यह भी देखा गया है कि मुहावरेदार भाषा अक्सर सही जगह पर वार करती है। असरदार होती है। शायद ऐसा ही असर पैदा करना चाहते थे हरियाणा के मुख्यमंत्री जब उन्होंने एक चुनावी सभा में 'खोदा पहाड़ और निकली चुहिया वाला मुहावरा काम में लिया।

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बात बनी या नहीं, यह तो वही जानें, पर बात बढ़ ज़रूर गयी है। मुख्यमंत्री ने यह बात कांग्रेस पर हमला करते हुए कही थी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी तीन महीने तक गांधी-परिवार से अलग किसी अध्यक्ष की तलाश कर रही थी, पर बाद में उसे सोनिया की शरण में ही जाना पड़ा। यह कहते हुए उन्होंने मुहावरा काम में लिया था, खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। फिर उन्होंने चार शब्द और जोड़ दिये-वह भी मरी हुई। अब आप कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष को मरी हुई चुहिया कहेंगे तो बात का बतंगड़ तो बनेगा ही। सो, बना। कांग्रेस इसे अपनी अध्यक्ष का अपमान बता रही है और मांग कर रही है कि मुख्यमंत्री महोदय मुंह से निकली बात के लिए क्षमा मांगें। जबाव में मुख्यमंत्री मुहावरे में कही गयी बात का सहारा ले रहे हैं। वैसे तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है यह। हमारे राजनेता अपने विरोधियों के लिए न जाने किस-किस तरह के शब्द काम में लेते रहे हैं। ऐसे मौकों पर शोर भी मचे हैं, पर वक्त के साथ मामले शांत भी होते रहे हैं। यह मरी हुई चुहिया वाला मामला भी शांत होगा ही, वैसे ही जैसे चौकीदार चोर है वाली बात अब कोई नहीं कह रहा। पर सवाल यह उठता है कि हमारे नेता भद्र भाषा में, यानी ऐसी भाषा में जो ग़लत न लगे, अपनी बात क्यों नहीं कह सकते  मुहावरेदार भाषा बोलना कतई ग़लत नहीं है, पर सवाल बात कहने के पीछे की नीयत का है—आप प्रभावशाली ढंग से अपनी बात कहना चाहते हैं या किसी भी हद तक जाकर अपने विरोधी को नीचा दिखाना चाहते हैं। यह किसी भी हद तक वाली बात महत्वपूर्ण है। बरसों से हम राजनीति में घटिया तरीकों और घटिया शब्दों का इस्तेमाल होते देख रहे हैं। पप्पू और फेंकू जैसे शब्दों का ग़लत लाभ उठाने के उदाहरण बहुत पुराने नहीं हैं। विरोधियों को बेईमान और स्वयं को चरित्रवान बताने-जताने की हर संभव कोशिश करते देखा है हमने अपने नेताओं को। मुहावरों और जुमलों की इस राजनीति ने हमारी राजकरण की समूची चादर को बुरी तरह मैला कर दिया है पर हमारे राजनेताओं को सिर्फ दूसरे की चादर ही मैली दिखती है। अपनी चादर के द़ाग न उन्हें दिखते हैं और न ही वे उन्हें देखना चाहते हैं।

वैसे तो राजनीति को शैतानों की अंतिम शरणस्थली भी कहा गया है, पर हम यह मानकर चलना चाहते हैं कि सभी राजनेता उतने बुरे नहीं हैं, जितना उन्हें कहा अथवा समझा जाता है। हम यह मानकर चलना चाहते हैं कि हमारी राजनीति का उद्देश्य समाज को, देश को, बेहतर बनाना है। जीवनयापन की स्थितियों को सुधारना है। सबको साथ लेकर सबका विकास करना है। पर जब ये सारी बातें जुमलेबाजी लगने लगें और जब यह लगने लगे कि राजनीति में लगे लोगों की निगाहें सत्ता-सुख पर ही टिकी हुई हैं और इसके लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं तो सवाल उठने लाज़मी हैं। यह सवाल तो उठना ही चाहिए कि अपने प्रतिपक्षी को नीचा दिखाने के लिए, कथनी और करनी दोनों में, नीचे उतरना क्यों ज़रूरी समझा जाता है  क्यों हमारे राजनेता शब्दों की मर्यादा को अक्सर भूल जाते हैं  राजनीति में भाषा की शालीनता क्यों बनी नहीं रह सकती  क्यों मुहावरों और जुमलों की आड़ में घटिया राजनीति का खेल खेला जाता है  चुनावी सभाओं से लेकर विधानसभाओं और संसद तक में ऐसे शब्द काम में लिये जाते हैं, जिन्हें असंसदीय घोषित करना पड़ता है! सुना है, ऐसे शब्दों का एक अच्छा-खासा शब्दकोश-सा ही तैयार हो गया है!
मूल सवाल राजनीति में शालीनता का है। जनतंत्र में विरोधी दुश्मन नहीं होता, विरोध विचारधारा का होता है, नीतियों का होता है। क्या शालीन भाषा में विरोध नहीं हो सकता  विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए या उन्हें कमतर बताने के लिए घटिया शब्दों का इस्तेमाल करना क्यों ज़रूरी हो  किसी को विदेशी गाय और उसके बच्चों को बछड़े कहकर क्या प्राप्त किया जा सकता है  किसी को चोर घोषित करने से क्या हाथ आयेगा  क्यों हमारे राजनेता घटिया भाषा का इस्तेमाल करके अपने ओछेपन का परिचय देते हैं  क्यों उन्हें बार-बार यह कहना पड़ता है कि उनके कहने का वह मतलब नहीं था, जो निकाला जा रहा है। ज़बान फिसल जाने वाली बात समझ आ सकती है, पर अपने विरोधी को नीचा दिखाने के लिए ही क्यों फिसलती है ज़बान  ये सारे, और ऐसे ही कई और सवाल उठने चाहिए। स्वस्थ जनतांत्रिक परंपराओं और मर्यादाओं का तकाज़ा है कि हम अपने नेताओं से पूछें कि उन्हें दूसरों की कथित कमियों को गिनाने के बजाय अपनी अच्छाइयों पर भरोसा क्यों नहीं होता। वैयक्तिक संबंधों से लेकर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता तक शब्दों और भाषा की मर्यादा का पालन होना ही चाहिए। हम दृष्टिहीन को अंधा नहीं, सूरदास कहना बेहतर समझते हैं। अपंग को दिव्यांग कहकर संबोधित करते हैं। ऐसे में अपने राजनीतिक विरोधियों के बारे में कुछ कहते समय हम भाषा का संयम क्यों नहीं बरत सकते  मुहावरों का सहारा लेकर किसी की तुलना मरी हुई चुहिया से करना शालीनता की परिभाषा में तो नहीं ही आता। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है कि राजनीति में सब कुछ माफ है।

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मानने वाले एक के बाद दूसरा घटिया उदाहरण प्रस्तुत करते रहते हैं। यह बीमारी हमारी सारी राजनीति को ग्रस्त किये हुए है। कोई भी राजनीतिक दल यह महसूस नहीं करता लग रहा कि उसे ऊंचे आचरण का उदाहरण सामने रखना है। चुनावी सभाओं में जुमले और मुहावरे उछाल कर वे तालियां बटोरने में लगे दिखाई देते हैं। यह व्यवहार अपरिपक्व राजनीति का उदाहरण तो है ही, हमारी समूची राजनीतिक संस्कृति को भी बदनाम करने वाला है। भाषा का संयम पहली सीढ़ी है। जिस पर चढ़कर हम एक स्वस्थ राजनीति की ओर बढ़ते कदम का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। यह बात हमारे राजनेता कब समझेंगे।

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