हे मधुमक्खी तुम्हें नमन! तुम हो तो पृथ्वी पर हम हैं 

 हे मधुमक्खी तुम्हें नमन! तुम हो तो पृथ्वी पर हम हैं 

हे मधुमक्खी तुम्हें नमन! तुम हो तो पृथ्वी पर हम हैं 

Posted by: Firsteye Desk, Updated: 25/10/19 01:25:37pm


अरुण अर्णव खरे
हे मधुमक्खी तुम्हें नमन! तुम हो तो पृथ्वी पर हम हैं, हमारे बच्चे हैं, खुशी है, मस्ती है। हमें ये बात कुछ समय पूर्व ही पता चली जब रॉयल जियोग्राफिकल सोसायटी ने लंदन में मानव-जीवन की उत्तरजीविता के लिए तुमको सबसे जरूरी जीव बताया। हमें बताया गया है कि यदि तुम नहीं रहोगी तो मानव जीवन भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। नब्बे प्रतिशत खाद्य वस्तुओं का उत्पादन करने में तुम्हारी बहुत बड़ी भूमिका है। तुम अगर फसलों का परागण न करो तो सत्तर प्रतिशत फसलें नष्ट हो जाएंगी। अल्बर्ट आइंस्टीन वर्षों पहले हमें चेता गए थे, अगर धरती से मधुमक्खियां लुप्त हो गईं तो मानव जीवन अधिकतम चार साल ही धरती पर रह पाएगा।

इस गांव के पानी में मिला है खतरनाक जहर, कर रहा है जिस्म को खोखला 

तुम इतनी जरूरी हो, हममें से अधिकांश को पता ही नहीं था। कैसे पता चलता, हम तुम्हारे डंक से डरते जो थे। तुम्हारे सारे गुण इस डंक की वजह से हमारी नजरों से ओझल थे अब तक। इसमें हमारा क्या कसूर, डंक है ही ऐसी चीज। मच्छर डंक मार दे तो मलेरिया से लेकर डेंगू होने तक का भय। बिच्छू का डंक चुभ जाए तो शरीर में जहर फैलने का खतरा। तुम्हारा डंक भी तो कम खतरनाक नहीं इनसे। तुम तो अकेले ही नहीं, पूरे झुंड में काटने चली आती हो।
सही है तुम केवल छेडऩे पर ही काटती हो पर हमें तो छेड़छाड़ करने की प्रकृति-प्रदत्त आदत है। जो हमें जीवनदायी वस्तुएं देता है, हम उसी को ठिकाने लगाने में जुट जाते हैं। नदियों को लो, हमने उनके साथ इतनी मनमानी की, उन्हें इतना गंदा कर दिया कि उनका पानी तक जहरीला हो गया। जंगल उजाड़ डाले, जमीन के नीचे का समूचा पानी खींचने में लगे हुए हैं, प्लास्टिक और ई-वेस्ट के पहाड़ खड़े कर रहे हैं, पर्यावरण के लिए जरूरी चिडिय़ों, चमगादड़, बाज व तितलियों जैसी बहुत-सी प्रजातियों के खत्म होने का कारण हम बन गए हैं। फर्टिलाइजर और कीटनाशकों से भी बच जाने वाले कीट-पतंगों की प्रजातियों के लिए हमने ऊंचे-ऊंचे टॉवरों से रिसने वाले रेडिएशन की चुनौती पेश कर दी है, लो अब बच के दिखाओ तो जानें। वैसे हे हनी बी, इतने खास सम्बन्धों की प्रणेता को हम कभी पहचान नहीं पाए। तुम नहीं होगी तो हम किसी को हनी कहकर नहीं बुला सकेंगे।

बढ़ती उम्र में नये अनुभवों संग जीना

तुम परेशान न हो प्रिय सखी, हम मरना नहीं चाहते। हमारा जीवन तुम पर टिका है तो हम तुम्हें कैसे मरने देंगे। सेंक्चुरी बनाकर सहेजेंगे। ये हमारे काम करने का तरीका है-पहले हम नष्ट करते हैं फिर सहेजने का उपक्रम करते हैं। शेर कम होने लगे तो हमने उनकी संख्या बढ़ाने का प्रयास किया कि नहीं। मगरमच्छ घटे तो उनके प्रजनन की व्यापक व्यवस्था की कि नहीं। तुम आस्वस्त रहो, हम तुम्हें बचाएंगे। बच्चन जी का यह गीत आज याद आ रहा है-इस पार, प्रिये, मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा। हमें पता चल गया है कि इस पार तुम हो, मधु है तो जीवन भी इस पार ही है। उस पार जाने की चिंता फिलहाल करें ही क्यों।
 

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