छठ महापर्व व्रत कथा, और पूजन विधि

छठ महापर्व व्रत कथा, और पूजन  विधि

छठ महापर्व व्रत कथा, और पूजन विधि

Posted by: , Updated: 02/11/19 01:24:37pm


फर्स्ट आई न्यूज़ डेस्क स्पेशल 
छठ महापर्व जो दिवाली के बाद छठे दिन मनाया जाता हैं। कार्तिक शुक्ल  के महीने में पूर्ण विधि विधान के साथ इस व्रत को किया जाता हैं। यह व्रत  कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ३१ अक्टुबर से नहाय खाय के साथ शुरू किया गया था। जिसका बड़े ही  कड़ाई  से पालन किया जाता है।दूसरे  दिन खड़ना के पूजा  विधि का पालन किया गया। इस पूजा में सायंकाल के समय पूरी 
श्रध्दा भक्ति के साथ गुड़ और दूध का खीर बनाकर छठी मईया को भोग लगाया गया हैं।

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इसका प्रसाद पूरे परिवार को खिलाया जाता हैं।कार्तिक शुक्ल  षष्ठी के शाम में घर पर महिला निराहार रहकर शाम तक छठि मईया के लिए प्रसाद बनाती हैं, जिसमें ठकुवा और चावल का लड्डु खास होता हैं। इसके बाद  शाम को एक डलिए में फलफूल  नारियल पकवान  को सजाकर गंगा के घाट पर ले जाया जायेगा, जिस दौरान सांझ को भगवान सूर्यदेव को अर्घ्य देकर उपवास की हुई महिलायें पुजा-अर्चना करेंगी। कुछ भक्त मन्नत को  पूरा  करने के लिए छठि मईया के पूजा के लिए फल लेकर पानी में घण्टों खड़े रहगें, इस वर्त को लेकर ये मान्यता हैं, कि इसे करने से भक्तो की  सारी मनोकामना पूरी  होती हैं।

छठ पूजा तिथि व मुहूर्त-

2 नवंबर 2019
छठ पूजा के दिन सूर्योदय – सुबह 6 बजकर 33 मिनट 
छठ पूजा के दिन सूर्यास्त – शाम 5 बजकर 35 मिनट 

छठ पुजा करने की विधि-

शाम के समय छठी मईया की पूजा  बांस के सूप में फल-फूल  चावल के लड्डू ठकुवा नारियल मूली  आदि से घी का दीपक जलाकर  अर्घ्य दिया जायेगा। तथा अर्घ्य देने के दौरान दूध या पानी चढ़ाया जाता हैं। और उपवास करने वाली महिला रात्री के समय छठी मईया के गीत गाती हैं। और व्रत कथा सुनती हैं।   

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छठी मां का प्रसाद-
इन दिनों में छठी मइया को ठेकुआ, मालपुआ, खीर, सूजी का हलवा, चावल के लड्डू, खजूर आदि का भोग लगाना शुभ माना जाता है।

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छठ पूजा की  व्रत कथा
एक राजा था जिसका नाम स्वयंभू मनु था। उनका एक पुत्र प्रियवंद था। प्रियवंद को कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई,जिसक कारण वो दुखी रहा करते थे। तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी को प्रसाद दिया, जिसके प्रभाव से रानी का गर्भ तो ठहर गया, किंतु मरा हुआ पुत्र उत्पन्न हुआ।

राजा प्रियवंद उस मरे हुए पुत्र को लेकर श्मशान गए। पुत्र वियोग में प्रियवंद ने भी प्राण त्यागने का प्रयास किया। ठीक उसी समय मणि के समान विमान पर षष्ठी देवी वहां आ पहुंची। राजा ने उन्हें देखकर अपने मृत पुत्र को जमीन में रख दिया और माता से हाथ जोड़कर पूछा कि हे सुव्रते! आप कौन हैं

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तब देवी ने कहा कि मै छठी  माता हूं। साथ ही इतना कहते ही देवी छठी  ने उस बालक को उठा लिया और खेल-खेल में उस बालक को जीवित कर दिया। जिसके बाद माता ने कहा की तुम मेरी पूजा करो। मैं प्रसन्न होकर तुम्हारे पुत्र की आयु लंबी करूंगी और साथ ही वो यश को प्राप्त करेगा। जिसके बाद राजा ने घर जाकर बड़े उत्साह से नियमानुसार षष्ठी देवी की पूजा संपन्न की। जिस दिन यह घटना हुई और राजा ने वो पूजा की उस दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को की गई थी। जिसके कारण तब से षष्ठी देवी यानी की छठ देवी का व्रत का प्रारम्भ हुआ। 

 

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