लखनऊ। फैजाबाद रोड से लेकर मटियारी–देवा मार्ग तक अवैध निर्माण का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रशासनिक कार्रवाई के दावों के बीच सील किए गए भवन में दोबारा तेज़ी से हुए निर्माण ने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
फैजाबाद रोड पर वी-मार्ट के ठीक पहले स्थित एक अवैध निर्माण को अवर अभियंता भरत पाण्डे द्वारा 08 जुलाई 2025 को सील किया गया था। उस समय भवन निर्माण अधूरा था और सीलिंग का स्पष्ट उद्देश्य आगे किसी भी निर्माण गतिविधि को रोकना था।
सील के बाद बदली तस्वीर, तेजी से आगे बढ़ा निर्माण
अब जब उसी भवन की वर्तमान स्थिति सामने आई है, तो साफ दिख रहा है कि सीलिंग के बावजूद निर्माण कार्य न सिर्फ जारी रहा, बल्कि तेजी से पूरा भी किया गया। यह हालात अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं—
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क्या सीलिंग की कार्रवाई सिर्फ फाइलों तक सीमित थी?
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या फिर सील के बाद निर्माण की अनुमति किसी अंदरूनी मिलीभगत के तहत दी गई?
सीलिंग की कार्रवाई पर सवाल, अधिकारियों की भूमिका संदेह में
यदि किसी भवन को विधिवत सील किया गया था, तो उसके बाद उसमें निर्माण कैसे संभव हुआ? यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि सील की शर्तों का खुला उल्लंघन है। इस पूरे मामले में संबंधित विभागीय अधिकारियों की भूमिका अब संदेह के घेरे में आ गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित रह जाती है, जबकि ज़मीनी स्तर पर अवैध निर्माण बेरोकटोक चलता रहता है।
मटियारी चौराहे से देवा मार्ग तक भी हालात वही
मामला सिर्फ फैजाबाद रोड तक सीमित नहीं है। मटियारी चौराहे से देवा जाने वाले मार्ग पर भी इस समय अवैध निर्माण खुलेआम जारी हैं। न तो कहीं स्वीकृत मानचित्र की जानकारी है और न ही प्रभावी रोकथाम दिखाई दे रही है।
क्या अवैध निर्माण के लिए ‘सुरक्षित ज़ोन’ बन चुका है इलाका?
लगातार सामने आ रहे मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि—
क्या फैजाबाद रोड से मटियारी–देवा मार्ग तक का पूरा इलाका अब अवैध निर्माण के लिए सुरक्षित कॉरिडोर बन चुका है, जहां कार्रवाई केवल कागज़ों और फोटो तक सिमट कर रह गई है?
सबसे बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी?
सील किए गए भवनों में निर्माण जारी रहना और नए अवैध निर्माणों का बेखौफ चलना यह साबित करता है कि समस्या सिर्फ बिल्डरों की नहीं, बल्कि निगरानी और प्रवर्तन तंत्र की गंभीर विफलता की है।
अब सवाल यह नहीं है कि अवैध निर्माण हो रहा है या नहीं—सवाल यह है कि सील के बाद निर्माण कराने वालों और इसे नजरअंदाज करने वालों पर कार्रवाई कब होगी? या फिर मान लिया जाए कि नियम और कानून अब सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित रह गए हैं?
