इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के पीसीएस अधिकारी पर लगे बलात्कार और ब्लैकमेलिंग के आरोपों की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बने संबंधों को रेप नहीं माना जा सकता। पीड़िता द्वारा वीडियो वायरल करने और जान से मारने की धमकी देने के आरोप पहली नजर में टिकने योग्य नहीं पाए गए। इसके बाद कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज चार्जशीट और क्रिमिनल कार्रवाई को रद्द कर दिया।
मामला और आरोप
यह मामला 1 दिसंबर 2023 का है, जब पीड़िता ने बरेली में शिकायत दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि पीसीएस अधिकारी ने 7 अगस्त 2027 को अपने जन्मदिन पर उसे होटल में बुलाकर बलात्कार किया। आरोपी ने कथित रूप से आपत्तिजनक वीडियो बनाकर उसे वायरल करने की धमकी दी और अलग-अलग होटलों में कई बार बलात्कार किया। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके कजिन के साथ संबंध बनाने के लिए दबाव डाला।
कोर्ट ने जांच में पाया गंभीर शक
जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने मामले से जुड़े सभी दस्तावेज और सबूतों की जांच की। कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता ने स्वयं कहा कि उसने वीडियो नहीं देखे थे, जिससे वीडियो वायरल करने की धमकी और ब्लैकमेलिंग के आरोपों की पुष्टि नहीं हो पाती। दोनों पक्ष 2017 से एक-दूसरे को जानते थे और कई जगहों पर मिलने के सबूत भी सामने आए।
अहम टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा महिला और आरोपी के बीच आपसी सहमति से बने संबंध को रेप नहीं माना जा सकता। पीड़िता के परिजनों को वीडियो भेजे जाने और होटल में बलात्कार होने के आरोपों की पुष्टि भी नहीं हुई। चार्जशीट और आरोपी के खिलाफ क्रिमिनल कार्रवाई रद्द कर दी गई।
