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उड़ीसा मॉडल पर उठे सवाल, पूर्वांचल-दक्षिणांचल डिस्कॉम निजीकरण रद्द करने की मांग तेज

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने राज्य में बिजली वितरण कंपनियों के प्रस्तावित निजीकरण पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे तत्काल निरस्त करने की मांग की है। समिति ने ओडिशा (उड़ीसा) के मॉडल का हवाला देते हुए कहा कि वहां के अनुभव से यह स्पष्ट है कि निजीकरण के बावजूद सरकार पर वित्तीय बोझ कम नहीं हुआ, बल्कि कई मामलों में बढ़ा है।

उड़ीसा मॉडल पर उठे सवाल

समिति के अनुसार, जून 2020 में उड़ीसा की बिजली वितरण कंपनियों का संचालन टाटा पावर को सौंपा गया था। इसके बाद बीते पांच वर्षों में राज्य सरकार को लगभग 7200 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देनी पड़ी। इसमें 5400 करोड़ रुपये की प्रारंभिक सहायता और 1800 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मदद शामिल है।

इसके अलावा स्मार्ट मीटरिंग के लिए करीब 900 करोड़ रुपये का खर्च भी सरकार ने ही वहन किया। समिति का कहना है कि जब बिजली खरीद पर मिलने वाली सब्सिडी का भार भी सरकार उठा रही है, तो निजीकरण की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

टैरिफ वृद्धि पर सवाल

संघर्ष समिति ने यह भी सवाल उठाया कि यदि कंपनियां अपनी बैलेंस शीट में मुनाफा दिखा रही हैं और एटीएंडसी (AT&C) हानियों में कमी का दावा कर रही हैं, तो फिर लगातार टैरिफ बढ़ाने की मांग क्यों की जा रही है।

समिति का तर्क है कि यदि कंपनियां लाभ में हैं, तो इसका फायदा उपभोक्ताओं को मिलना चाहिए, न कि उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जाए।

यूपी मॉडल को बताया बेहतर

समिति ने उत्तर प्रदेश की मौजूदा व्यवस्था को बेहतर बताते हुए कहा कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पिछले नौ वर्षों में बिजली वितरण कंपनियों ने एटीएंडसी हानियों में लगातार कमी दर्ज की है।

साथ ही, किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त टैरिफ बोझ नहीं डाला गया। किसानों के लिए मुफ्त बिजली जैसी योजनाओं को भी सार्वजनिक क्षेत्र की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया।

निजीकरण के खिलाफ आंदोलन जारी

समिति ने स्पष्ट किया कि उड़ीसा के अनुभव से यह निष्कर्ष निकलता है कि निजीकरण के बाद भी यदि सरकार को आर्थिक सहायता देनी पड़े, तो यह मॉडल न सरकार के लिए फायदेमंद है और न ही आम जनता के लिए।

इसी मांग को लेकर पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के विरोध में कर्मचारियों का आंदोलन जारी है। आज 498वें दिन भी प्रदेश के विभिन्न जिलों में कर्मचारियों ने प्रदर्शन कर सरकार से निर्णय वापस लेने की मांग दोहराई।

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