लखनऊ: मोहर्रम के मौके पर शुक्रवार को देशभर में हजरत इमाम हुसैन और कर्बला के 72 शहीदों को याद किया गया। ताज़िया, आलम, मातम, नोहाख़ानी और मर्सिया के जरिए उन्हें ख़िराज-ए-अकीदत पेश की गई। वहीं, नवाबों के शहर लखनऊ में एक बार फिर गंगा-जमुनी तहज़ीब की अनूठी मिसाल देखने को मिली, जहां कई हिंदू परिवार वर्षों से अपने घरों में ताज़िया रखकर मोहर्रम की रस्में पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभा रहे हैं।
20 वर्षों से निभाई जा रही परंपरा
लखनऊ निवासी रीता देवी बताती हैं कि उनके परिवार में पिछले करीब 20 वर्षों से ताज़िया रखा जा रहा है। पहले उनकी मां इस परंपरा को निभाती थीं और अब शादी के बाद उनके ससुराल में भी यह सिलसिला जारी है।
रीता के मुताबिक, उनकी मां ने संतान की सलामती के लिए मन्नत मानी थी कि यदि बच्चा सुरक्षित रहेगा तो वह हर साल ताज़िया रखेंगी। इसके बाद उनका जन्म हुआ और परिवार आज भी उस मन्नत को निभा रहा है। उन्होंने बताया कि मोहर्रम शुरू होने से करीब दस दिन पहले ही ताज़िए की सजावट और अन्य तैयारियां शुरू हो जाती हैं तथा सभी रस्में पूरी श्रद्धा से निभाई जाती हैं।

घर में दोनों धर्मों की परंपराएं
रीता ने बताया कि उनकी मां मुस्लिम थीं जबकि पिता हिंदू पंडित थे। दोनों ने प्रेम विवाह किया था, इसलिए घर में हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की परंपराओं का सम्मान किया जाता था। उन्होंने कहा कि उनके भाई हिंदू रीति-रिवाज निभाते हैं, जबकि वह मुस्लिम परंपराओं का पालन करती हैं। उनका कहना है कि दोनों धर्मों में उनकी समान आस्था है और समाज में प्रेम और भाईचारे का संदेश ही सबसे बड़ा है।
‘अल्लाह और भगवान में कोई फर्क नहीं’
वाल्मीकि समाज से आने वाले राजकुमार का कहना है कि उनके लिए अल्लाह और भगवान में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने कहा कि धर्म इंसानों ने बनाए हैं, लेकिन ईश्वर एक ही है। उनके अनुसार धर्म के नाम पर विवाद नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और सौहार्द होना चाहिए।
राजकुमार बताते हैं कि जिस तरह हिंदू समुदाय जागरण में सहयोग करता है, उसी तरह वे मोहर्रम में ताज़िए की सजावट, मातम, मर्सिया और भंडारे में हिस्सा लेते हैं। उनके इलाके से हर साल हजारों ताज़िए निकलते हैं, जिन्हें 10 मोहर्रम की रात कर्बला में दफन किया जाता है।
मन्नत पूरी होने के बाद चढ़ाते हैं ताज़िया
सुनीता चौहान ने बताया कि उनका परिवार पिछले 15 वर्षों से मोहर्रम के अवसर पर ताज़िया चढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि उनकी बड़ी बहन को संतान नहीं हो रही थी, जिसके बाद परिवार ने मन्नत मांगी थी। मन्नत पूरी होने पर वे हर वर्ष ताज़िया खरीदकर मजार पर चढ़ाते हैं। हालांकि वे घर में ताज़िया नहीं रखते, लेकिन पूरे परिवार के साथ रस्में निभाने के लिए जरूर शामिल होते हैं।
बीमारी से राहत की उम्मीद में शुरू हुई परंपरा
लखनऊ की पूजा बताती हैं कि उनके दोनों भाइयों की तबीयत अक्सर खराब रहती थी। किसी ने उन्हें चांदी का आलम रखने की सलाह दी थी। हालांकि आलम नहीं रखा जा सका, लेकिन तभी से उनके घर में ताज़िया रखने की परंपरा शुरू हो गई।
उन्होंने बताया कि पिछले करीब 19-20 वर्षों से उनकी मां नियमित रूप से ताज़िया रखती हैं। परिवार के सदस्य मोहर्रम की रस्मों में शामिल होते हैं और ताज़िया कर्बला ले जाकर दफन भी करते हैं।
लखनऊ की यह परंपरा एक बार फिर यह संदेश देती है कि शहर की गंगा-जमुनी तहज़ीब केवल एक सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि साझा आस्था, आपसी सम्मान और सामाजिक सौहार्द की जीवंत मिसाल भी है।
