रिपोर्ट: प्रिया बाजपेयी शुक्ला
लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को लखनऊ में यूपी पुलिस की जमीन पर भू-माफिया के कब्जे का किस्सा सुनाते हुए कानून-व्यवस्था और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पुलिस के नाम दर्ज जमीन पर माफिया ने अपना नाम दर्ज करा लिया था और दुनिया की सबसे बड़ी यूपी पुलिस मौन बनी रही। मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर वह उस समय संबंधित अधिकारी की जगह होते तो माफिया को बुलाकर दो किक मारते और जमीन खाली करा लेते। उन्होंने कहा कि आज अपराधी एक चौराहे पर अपराध करता है और अगले चौराहे पर ढेर हो जाता है।
सीएम योगी लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज (UPSIFS) में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संवाद-2026 के तहत टेक संगम सम्मेलन के दूसरे दिन उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने LEXQ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की शुरुआत की और ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन कंस्ट्रक्शन’ पुस्तक का विमोचन किया।
पुलिस की जमीन पर माफिया ने करा लिया था कब्जा
मुख्यमंत्री ने बताया कि लखनऊ इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास करीब 100 एकड़ जमीन यूपी पुलिस के नाम दर्ज थी, लेकिन भू-माफिया ने कथित तौर पर कागजों में हेराफेरी कर उस पर अपना नाम दर्ज करा लिया था। तत्कालीन डीजीपी से जानकारी मिलने के बाद उन्होंने जमीन के दस्तावेज मंगवाए और पूरे मामले की जांच कराई।
योगी ने कहा कि विभागीय स्तर पर हुई गलती सामने आने के बाद एफआईआर दर्ज कराई गई। आरोपी हाईकोर्ट पहुंचा तो दूसरी एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई आगे बढ़ाई गई। मुख्यमंत्री के मुताबिक, दूसरी एफआईआर दर्ज होते ही आरोपी ने सरेंडर कर दिया और जमीन वापस करने की बात कही।
उन्होंने एक अन्य मामले का जिक्र करते हुए कहा कि एक माफिया ने 1980 में पहला अपराध किया था। वर्ष 2017-18 में कार्रवाई शुरू होने के बाद उसे पंजाब स्थानांतरित कर दिया गया। उसे वापस लाने के लिए सरकार को सुप्रीम कोर्ट में करीब तीन साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। योगी ने कहा कि आखिरकार 42 साल बाद उसे सजा हुई।
सीआईडी सीरियल से फॉरेंसिक जांच तक का सफर
मुख्यमंत्री ने सीआईडी सीरियल का उदाहरण देते हुए बताया कि पहले लोग टीवी पर देखते थे कि किस तरह एक बाल या उंगलियों के निशान से अपराधी तक पहुंचा जाता है। उस समय ऐसी जांच लोगों को किसी सपने जैसी लगती थी, लेकिन आज फॉरेंसिक विज्ञान के जरिए इसे हकीकत में बदला जा रहा है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद जब उन्होंने डीएनए जांच के लिए लिए गए नमूनों की स्थिति पूछी, तो पता चला कि कुछ नमूने करीब 10 साल पुराने थे। साक्ष्यों की जांच में देरी से अपराधियों को बचने का मौका मिलता था और अदालतों में मुकदमे लंबे समय तक चलते थे।
योगी ने बताया कि पुलिस अधिकारियों ने फॉरेंसिक विशेषज्ञों की जरूरत बताई थी। इसके बाद विशेषज्ञों की नियुक्ति के साथ सैंपल जुटाने वाले कर्मियों को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया गया। उनके अनुसार, उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज में अब तक करीब 1,000 पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। प्रदेश में 150 से अधिक फॉरेंसिक वैन भी उपलब्ध हैं।
एआई का इस्तेमाल हो, लेकिन विवेक से समझौता नहीं
टेक संगम-2026 में मुख्यमंत्री ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), साइबर फॉरेंसिक, क्वांटम टेक्नोलॉजी और डेटा सुरक्षा की बढ़ती अहमियत पर भी बात की। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक ने काम करने की क्षमता बढ़ाई है, लेकिन डीपफेक, साइबर फ्रॉड और पहचान की चोरी जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि एआई तेजी से निर्णय लेने में मदद कर सकता है, लेकिन उसे अंतिम निर्णायक नहीं बनना चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल लोककल्याण के लिए होना चाहिए और उसके फैसलों पर आंख मूंदकर निर्भर नहीं होना चाहिए।
उन्होंने विज्ञान, तकनीक और भारतीय मूल्यों को साथ लेकर चलने की जरूरत बताते हुए कहा कि टेक संगम का उद्देश्य इन क्षेत्रों को एक मंच पर लाना है। सम्मेलन में विशेषज्ञों ने भी फॉरेंसिक जांच में एआई के इस्तेमाल, डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता और अदालत में उनकी स्वीकार्यता से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की।
