नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि दो वयस्क व्यक्ति अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं और इसके लिए उन्हें न तो समाज की मंजूरी की जरूरत है और न ही माता-पिता की सहमति अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि यह व्यस्कों का संवैधानिक अधिकार है, जिसमें किसी तरह का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।
यह टिप्पणी जस्टिस सौरभ बनर्जी ने एक शादीशुदा जोड़े की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने कहा कि सहमति से शादी करने वाले बालिगों के फैसले को पवित्रता और सम्मान दिया जाना चाहिए।
शादी करना मौलिक अधिकार: हाई कोर्ट
जस्टिस बनर्जी ने कहा कि शादी करने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है, जिसे न केवल मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) में मान्यता मिली है, बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी अहम हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की आजादी देता है और इसमें जीवनसाथी चुनने का अधिकार भी शामिल है।
शादी के बाद युवती के पिता से मिल रही थीं धमकियां
मामले में याचिकाकर्ता एक विवाहित जोड़ा है, जिसने जुलाई 2025 में आर्य समाज मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से शादी की थी और बाद में उसका विधिवत पंजीकरण भी कराया था।
याचिका में कहा गया कि शादी के बाद युवती के पिता इस रिश्ते के खिलाफ थे और कपल को लगातार धमकियां दी जा रही थीं। इसी कारण दोनों ने हाई कोर्ट में पुलिस सुरक्षा की मांग की।
कोर्ट का सख्त रुख
हाई कोर्ट ने कपल को पुलिस सुरक्षा देते हुए कहा कि जब दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और अपनी मर्जी से शादी कर चुके हैं, तो अब कोई भी—चाहे समाज हो, राज्य मशीनरी हो या माता-पिता—उनके फैसले में दखल नहीं दे सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी व्यक्ति को, विशेष रूप से युवती के पिता को, कपल की जान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरे में डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
लगातार मिलेगी पुलिस सुरक्षा
कोर्ट ने निर्देश दिया कि कपल को आवश्यक पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। जरूरत पड़ने पर उन्हें संबंधित SHO या बीट अधिकारी से सीधे संपर्क करने की अनुमति दी गई है।
यदि कपल अपना निवास स्थान बदलता है, तो उन्हें स्थानीय पुलिस को सूचित करना होगा, ताकि सुरक्षा व्यवस्था जारी रह सके।
