भारत में प्रस्तावित परिसीमन 2026 को लेकर राजनीतिक और नीतिगत चर्चाएं तेज हो गई हैं। यह प्रक्रिया देश की लोकतांत्रिक संरचना को नए सिरे से परिभाषित करने वाली मानी जा रही है। इसी संदर्भ में सामने आया ‘I-YUVA फॉर्मूला’ अब एक अहम बहस का केंद्र बनता जा रहा है, जिसे विशेषज्ञ संतुलित और समावेशी प्रतिनिधित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं।
परंपरागत रूप से परिसीमन का आधार मुख्यतः जनसंख्या रहा है, लेकिन तेजी से बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में केवल जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इससे विकसित और अविकसित क्षेत्रों के बीच असंतुलन बढ़ सकता है। ऐसे में ‘I-YUVA फॉर्मूला’ इस चुनौती का समाधान प्रस्तुत करता है।
यह फॉर्मूला प्रतिनिधित्व तय करने में जनसंख्या के साथ-साथ विकास स्तर, भौगोलिक परिस्थितियों और सामाजिक न्याय को भी समान महत्व देने की वकालत करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के हर क्षेत्र और हर वर्ग को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उचित भागीदारी मिल सके।
नीति विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस तरह का बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया जाता है, तो न केवल क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जा सकेगा, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता भी मजबूत होगी। इससे दूर-दराज और पिछड़े इलाकों की आवाज को भी प्रभावी मंच मिल सकता है, जो अब तक प्रतिनिधित्व के मामले में पीछे रह जाते थे।
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं होगा। विभिन्न राज्यों के हित और राजनीतिक समीकरण इस प्रक्रिया को जटिल बना सकते हैं। फिर भी, ‘I-YUVA फॉर्मूला’ ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि भविष्य का लोकतंत्र केवल संख्या का खेल न होकर, समानता और न्याय पर आधारित होना चाहिए।
निष्कर्षतः, परिसीमन 2026 भारत के लोकतंत्र के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। ऐसे में ‘I-YUVA फॉर्मूला’ एक ऐसे रोडमैप के रूप में उभर रहा है, जो देश को अधिक संतुलित, समावेशी और दूरदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर ले जाने की क्षमता रखता है।
