Home मनोरंजन जानिए कैसी है रणदीप हुड्डा की फिल्म ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर’

जानिए कैसी है रणदीप हुड्डा की फिल्म ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर’

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जानिए कैसी है रणदीप हुड्डा की फिल्म ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर’

स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर की बायोपिक के रूप में जाने-माने एक्टर रणदीप हुड्डा ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर’ लेकर आए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस रोल को पर्दे पर जीवंत करने में रणदीप ने अपनी जान झोंक दी है, मगर किरदार को महिमामंडित करने के लिए कई जगहों पर वे सिनेमैटिक लिबर्टी लेने से नहीं चूके। बहुत स्वाभाविक है कि जब किसी ऐतिहासिक या व्यक्ति विशेष पर फिल्म बनती है, तब उसके हीरोइज्म और उसी को केंद्र में रख कर फिल्म बनाई जाती है, मगर कहानी में यदि उसे श्रेष्ठ बताने के लिए अन्य महत्वपूर्ण किरदारों को छोटा बताया जाए, तो कई लोगों को ये बात खटक सकती है।

फिल्म ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ की कहानी

वीर सावरकर के जीवन पर आधारित इस फिल्म की कहानी उनके बचपन से लेकर उनके जीवन के अंतिम चरण तक की यात्रा तय करती है। कहानी इस बात को दर्शाती है कि कैसे सावरकर एक अखंड भारत की अदम्य इच्छा रखते थे। कैसे उनका अटल विश्वास था कि अंग्रेजों से आजादी अहिंसा से हासिल नहीं की जा सकती। कहानी की शुरुआत होती है, 18 वीं सदी के अंत में फैले हुए भयानक रोग प्लेग से।

देश अंग्रेजों का गुलाम है और इसी दासता के बीच वीर सावरकर का जन्म होता है। युवा सावरकर का अपनी पिता की मौत को देखना और फिर स्वयं क्रांतिकारी बनने के आह्वान करने से लेकर होती है। उनकी यात्रा का पहला पड़ाव फर्ग्युसन कॉलेज है, जहां वे गरम दाल के नेता लोकमान्य तिलक से मिलते हैं और क्रांति की आग को प्रखर करने के लिए अभिनव भारत जैसे क्रांतिकारी संगठन का निर्माण करते हैं। तब तक वीर सावरकर का विवाह अंकिता लोखंडे से हो चुका है।

‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ मूवी रिव्यू

अंग्रेजों का कानून जानने के लिए वो लंदन पहुंचते है, ताकि वे अंग्रेजों को सबक सिखा सकें। वहां उनकी जुगलबंदी स्वतंत्रता सेनानी मदनलाल ढींगरा, बीकाजी कामा और श्याम जी के साथ होती है। लंदन में भी वे अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की मशाल को तेज करते हैं। उन्हें गिरफ्तार कर दिया जाता है। उन्हें गैरकानूनी रूप से भारत भेज कर काले पानी की सजा दे दी जाती है। सावरकर के जीवन के प्रमुख जीवन-परिवर्तनकारी क्षणों पर प्रकाश डालती है।

इनमें उनके बड़े भाई दामोदार सावरकर का निरंतर साथ, महात्मा गांधी के साथ उनकी बातचीत, फ्रांस में शरण पाने के लिए भागने की योजना बनाने का उनका असफल प्रयास, अंडमान द्वीप समूह में उनका आजीवन कारावास उर्फ काला पानी। कालापानी में उन्हें अंग्रेजों के द्वारा दी जाने वाली भयानक यातना, अंग्रेजों से उनकी दया याचिका और इस याचिका के बाद अंडमान जेल से रत्नागिरी जेल में उनका स्थानांतरण जैसी घटनाएं शामिल हैं। उसके बाद उसकी आजादी। यह फिल्म जेल से छूटने के बाद उनके जीवन और उनके राजनीतिक करियर पर भी प्रकाश डालती है।