डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान ने एक बड़ी चिकित्सा उपलब्धि हासिल करते हुए नवजात शिशुओं में लिवर रोगों की समय रहते पहचान के लिए देश का पहला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित ऐप विकसित किया है। यह पहल बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों की टीम का योगदान
इस ‘लिवर पॉप’ ऐप को बाल रोग विशेषज्ञों की अनुभवी टीम के मार्गदर्शन में तैयार किया गया है। प्रमुख विशेषज्ञों में शामिल हैं:
Dr. Dipti Agarwal – 25+ वर्षों का अनुभव
Dr. Neha Thakur Rai
Dr. Krishna Kumar Yadav
Dr. Shetanshu Srivastava
Dr. Piyush Upadhyay
संस्थान के प्रवक्ता Dr. Bhuvan Chandra Tiwari ने बताया कि यह ऐप नवजातों में बाइलरी और लिवर रोगों की शुरुआती पहचान में बेहद उपयोगी साबित होगा।

क्या है इस ऐप की खासियत?
त्वरित जांच
मोबाइल कैमरे से शिशु की त्वचा और आंखों के रंग का विश्लेषण कर शुरुआती संकेत देता है।
बिना सुई के परीक्षण
खून के सैंपल की जरूरत नहीं—नवजात को दर्द से राहत।
मल्टी-लैंग्वेज सपोर्ट
यह ऐप 40 भाषाओं (22 भारतीय + 18 विदेशी) में काम करता है।
घर बैठे जांच
दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोग भी आसानी से शुरुआती जांच कर सकते हैं।
सटीक परिणाम
‘बिलीरुबिन’ स्तर को समझने में मदद करता है, जिससे समय पर इलाज संभव होता है।
क्यों है यह जरूरी?
नवजात शिशुओं में लिवर और बाइलरी रोगों की पहचान अक्सर देर से होती है, जिससे गंभीर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। यह ऐप समय रहते चेतावनी देकर इलाज की दिशा में पहला कदम आसान बनाता है।

ऐप की मुख्य विशेषताएं
त्वरित जांच: मोबाइल कैमरे से शिशु की त्वचा और आंखों के रंग का विश्लेषण कर तुरंत शुरुआती संकेत देता है।
बिना सुई के परीक्षण: बार-बार खून के सैंपल की जरूरत नहीं, नवजात को दर्द से राहत।
समय की बचत: दूरदराज के लोग भी घर बैठे प्राथमिक जांच कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत अस्पताल जा सकते हैं।
सटीकता: विशेषज्ञों के अनुसार, ऐप ‘बिलीरुबिन’ स्तर का आकलन कर काफी विश्वसनीय परिणाम देता है।
क्यों है यह तकनीक अहम?
यह तकनीक उन नवजात शिशुओं के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती है, जिन्हें जन्म के तुरंत बाद पीलिया (जॉन्डिस) की समस्या होती है। समय पर पहचान होने से गंभीर जटिलताओं से बचाव संभव है और इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है।
