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Maha Shivaratri: शिव और शक्ति के मिलन की दिव्य कथा, जानिए कैसे हुए शिव-पार्वती का मिलन?

तपस्या से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं, और भक्ति से शाश्वत शंकर की प्राप्ति होती है।
महाशिवरात्रि की रात मंदिर दीपों की रोशनी से जगमगाते हैं, घंटियां गूंजती हैं और भक्त “ॐ नमः शिवाय” का जाप करते हैं। कई लोग इसे शिव-पार्वती के विवाह की रात्रि मानते हैं, लेकिन इस उत्सव के पीछे एक गहन आध्यात्मिक कथा छिपी है—यह केवल विवाह नहीं, बल्कि चेतना (शिव) और ऊर्जा (शक्ति) के मिलन का दिव्य क्षण है।

सती के वियोग के बाद शिव का विरक्त होना

Shiva, महान तपस्वी और संहार के देवता, सती के देहांत के बाद गहन विरक्ति में चले गए।
Sati के वियोग ने उन्हें अंतर्मुखी बना दिया। वे संसार से दूर, समाधि और मौन में लीन हो गए। यह एकांत कमजोरी नहीं, बल्कि गहरी भावनात्मक साधना थी।

राजकुमारी नहीं, संकल्पित आत्मा थीं पार्वती

उसी समय जन्म हुआ Parvati का—हिमालय के राजा हिमवान और रानी मैना की पुत्री।
राजसी वैभव में पली-बढ़ी पार्वती का मन उस योगी में रमा, जो भस्म रमाए, व्याघ्रचर्म धारण किए और सांसारिक आभूषणों से परे थे। उन्होंने ऐश्वर्य नहीं, तपस्या का मार्ग चुना।

शिव को पाने के लिए कठोर तप

Shiva Purana के अनुसार, पार्वती ने कठोर तप किया—बर्फीली हवाओं में ध्यान, पत्तों पर निर्वाह और अंततः उनका भी त्याग।वे शिव से परिवर्तन की अपेक्षा नहीं कर रही थीं; वे स्वयं को उनकी चेतना के स्तर तक उठाना चाहती थीं।यह भक्ति कल्पना नहीं, अनुशासन और ज्ञान से उपजी थी।

परीक्षा: ऋषि के वेश में स्वयं शिव

Kumarasambhavam में वर्णित है कि शिव ने एक विचरणशील ऋषि का वेश धारण कर पार्वती की परीक्षा ली।उन्होंने शिव की कमियां गिनाईं—“वह बेघर है, भस्म रमाता है, प्रेतों से घिरा रहता है।”
पर पार्वती अडिग रहीं। उन्होंने शिव के ब्रह्मांडीय स्वरूप, वैराग्य और सर्वोच्च चेतना का शांत भाव से वर्णन किया। यह सिद्ध हुआ कि उनका प्रेम बाहरी रूप से नहीं, सत्य से था।

दुख से उपचार तक: मिलन का प्रतीक

सती के वियोग का घाव भरे बिना शिव का पुनः गृहस्थ जीवन संभव नहीं था। पार्वती को स्वीकार करना उपचार का प्रतीक था। उनके पुत्र Kartikeya ने आगे चलकर तारकासुर का वध किया और ब्रह्मांडीय संतुलन बहाल किया। यह विवाह एक व्यापक दिव्य योजना का हिस्सा था।

विरक्त से गृहस्थ: संतुलन का संदेश

Skanda Purana में वर्णन है कि शिव के गणों और भूत-प्रेतों को देखकर पार्वती का परिवार चकित रह गया। वैराग्य और राजसी परंपरा का यह संगम सिखाता है कि आध्यात्मिकता और उत्तरदायित्व साथ-साथ चल सकते हैं

दार्शनिक रूप से—शक्ति के बिना शिव शून्य हैं, और शिव के बिना शक्ति दिशाहीन।
Linga Purana में वर्णित अनंत ज्योति-स्तंभ अहंकार के विनाश और आत्मबोध का प्रतीक है।

महाशिवरात्रि का संदेश

महाशिवरात्रि केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन की रात्रि है।
जब दीपक टिमटिमाते हैं और मंत्रोच्चार गूंजते हैं, तब यह कथा हमें याद दिलाती है—

  • मिलन की कामना से पहले स्वयं को योग्य बनाओ।

  • आशीर्वाद से पहले रूपांतरण आवश्यक है।

  • तप से शुद्धि, भक्ति से सिद्धि मिलती है।

“ॐ नमः शिवाय” केवल मंत्र नहीं, आत्मा और परमात्मा के मिलन का आह्वान है।

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