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मुस्लिम उलेमा का विरोध, वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने को कहा ‘संविधान विरोधी’

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने केंद्र सरकार के वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे पक्षपाती और जबरदस्ती थोपे गए फैसले के रूप में वर्णित किया और कहा कि यह संविधान की धारा 25 और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन है।

मौलाना ने कहा, “मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है। इसे अनिवार्य करना संविधान की आत्मा, धार्मिक आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है।”

देवबंदी उलेमा ने भी उठाई आपत्ति

मुस्लिम धर्म गुरु और देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि इस्लाम में किसी की पूजा नहीं होती, इसलिए वंदे मातरम् के कुछ अल्फाज मुस्लिम धर्म के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने सरकार से कहा कि आदेश लागू करने से पहले धार्मिक भावनाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए

सरकार का आदेश और नया प्रोटोकॉल

केंद्र सरकार के केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी 2026 को आदेश जारी किया था कि वंदे मातरम् के सभी 6 छंद (3.10 मिनट) अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूल, कॉलेज और राज्य आयोजनों में अनिवार्य रूप से गाए जाएंगे।
इसके तहत राष्ट्रपति के आगमन, तिरंगा फहराने और राज्यपालों के भाषण जैसी आधिकारिक प्रक्रियाओं में भी राष्ट्रगीत को पूरी तरह प्रस्तुत करना होगा।

मौलाना का तर्क

अरशद मदनी ने कहा कि मातृभूमि से प्रेम का आधार नारे या गीत नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान हैं। उनका कहना है कि यह कदम देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने वाला है और इसे चुनावी राजनीति और सांप्रदायिक एजेंडे से जोड़कर देखा जा सकता है।

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