लखनऊ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के हालिया अधिसूचित कानून को लेकर चल रहे विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के नेता हरीश श्रीवास्तव का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि सरकार इस कानून पर पुनर्विचार कर सकती है, क्योंकि लोकतंत्र में अलग-अलग मतों को सुना जाना जरूरी है।
एबीपी न्यूज़ से बातचीत में हरीश श्रीवास्तव ने कहा कि किसी भी नीति को लेकर असहमति होना अस्वाभाविक नहीं है और जब समाज के विभिन्न वर्गों से प्रतिक्रियाएं आती हैं, तो सरकार उन पर गंभीरता से मंथन करती है।
इस्तीफों पर बोले—हर फैसले के पीछे कारण होते हैं
UGC कानून के विरोध में कुछ बीजेपी नेताओं द्वारा दिए गए इस्तीफों पर प्रतिक्रिया देते हुए हरीश श्रीवास्तव ने कहा कि उन्हें इस्तीफे के व्यक्तिगत कारणों की पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन नीतिगत फैसलों पर मतभेद लोकतंत्र की ताकत होते हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले कई पहलुओं को देखती है और अगर नए तथ्य या दृष्टिकोण सामने आते हैं, तो उन पर दोबारा विचार किया जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है।
जियाउर्रहमान के बयान पर संतुलित प्रतिक्रिया
संभल से सांसद जियाउर्रहमान के UGC कानून को लेकर दिए गए बयान पर भी हरीश श्रीवास्तव ने संतुलित रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि“हर व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार है। मतभेद होना लोकतंत्र को मजबूत करता है।”हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार अंतिम निर्णय समग्र विचार-विमर्श के बाद ही लेती है।
अलंकार अग्निहोत्री मामला: नियमों से ऊपर कोई नहीं
पीसीएस अधिकारी और बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट रहे अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे को लेकर हरीश श्रीवास्तव ने साफ कहा कि सरकारी सेवा में अनुशासन सर्वोपरि है।
उनका कहना था कि संवैधानिक पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति को अपनी सेवा शर्तों और आचार संहिता का पालन करना चाहिए।“अगर किसी को नीतियों से असहमति है, तो पहले पद से हटकर अपनी बात रखनी चाहिए।”उन्होंने बताया कि सरकार ने पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं और सच्चाई जांच के बाद सामने आएगी।
लोकतंत्र बनाम अनुशासन की बहस
हरीश श्रीवास्तव ने कहा कि एक आम नागरिक के तौर पर विचार व्यक्त करना अधिकार है, लेकिन सरकारी पद पर रहते हुए व्यक्तिगत विचार और संवैधानिक मर्यादा के बीच संतुलन जरूरी है।
