अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा अंतरिम आदेश जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक अरावली की स्पष्ट और वैज्ञानिक परिभाषा तय नहीं हो जाती, तब तक कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जाएगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अरावली की सीमाओं और स्वरूप को लेकर मौजूद अस्पष्टता को दूर करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाएगी। पर्यावरण मंत्रालय से समिति के लिए नाम सुझाने को कहा गया है, जबकि संबंधित पक्षों के वरिष्ठ वकीलों से भी विशेषज्ञों के नाम मांगे गए हैं। समिति की रिपोर्ट आने तक सभी नए खनन पट्टों पर रोक प्रभावी रहेगी।
परिभाषा पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि सबसे बड़ी समस्या यही है कि अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि अरावली की सटीक परिभाषा क्या है। यह टिप्पणी उस समय आई जब एक पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद खनन पट्टा प्राप्त किया गया है।
अदालत ने कहा कि जब तक मूल प्रश्नों का समाधान नहीं होता, तब तक न केवल नए पट्टे रोके जाएंगे बल्कि जिन मामलों में अनुमति दी जा चुकी है, उनमें भी सावधानी बरती जाएगी।
100 मीटर नियम बना विवाद की जड़
विवाद का केंद्र अरावली की नई परिभाषा है। प्रस्तावित नियम के अनुसार केवल वे पहाड़ियां अरावली का हिस्सा मानी जाएंगी, जिनकी ऊंचाई आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली संरचनाएं इस दायरे से बाहर हो सकती हैं, जिससे उन क्षेत्रों में खनन और अन्य गतिविधियों का रास्ता खुलने की आशंका जताई जा रही है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री Bhupender Yadav पहले कह चुके हैं कि अरावली के लगभग 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही खनन की अनुमति है।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अरावली क्षेत्र में नए खनन कार्यों पर ब्रेक लग गया है। अब सबकी निगाहें विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो आगे की दिशा तय करेगी।
