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एसपी अपर्णा कौशिक की प्रेस ब्रीफिंग पर अभद्र टिप्पणी

 

लखनऊ/मिर्ज़ापुर: उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर ज़िले की पुलिस अधीक्षक (एसपी) अपर्णा रजत कौशिक की एक आधिकारिक प्रेस ब्रीफिंग का वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है। यह वीडियो एक अहम गिरफ्तारी से जुड़े मामले की जानकारी देने के लिए जारी किया गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश चर्चा का केंद्र पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि एसपी के व्यक्तित्व और उनके लुक्स बन गए।

मिर्ज़ापुर पुलिस द्वारा इंस्टाग्राम पर साझा किए गए इस वीडियो को महज़ पांच दिनों में लगभग 47 लाख व्यूज़ मिल चुके हैं, जबकि करीब 65 हज़ार से अधिक कमेंट्स दर्ज किए गए। हैरानी की बात यह रही कि इन टिप्पणियों में बड़ी संख्या ऐसे यूज़र्स की थी जिन्होंने पुलिस की कार्रवाई या मामले की गंभीरता पर प्रतिक्रिया देने के बजाय एसपी के कद-काठी, चेहरे और दिखावे को लेकर आपत्तिजनक और भद्दी टिप्पणियां कीं।

स्थिति बिगड़ती देख मिर्ज़ापुर पुलिस को आखिरकार पोस्ट के कमेंट सेक्शन को बंद करना पड़ा। यह कदम ऑनलाइन बढ़ती अभद्रता और व्यक्तिगत हमलों के बीच एक जरूरी हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।

बढ़ती डिजिटल असंवेदनशीलता पर सवाल

यह घटना सोशल मीडिया पर बढ़ती असंवेदनशीलता और गैर-जिम्मेदार व्यवहार को उजागर करती है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जो कानून-व्यवस्था जैसे गंभीर विषय पर जानकारी दे रही थीं, उन्हें उनके कार्य के बजाय उनके बाहरी रूप के आधार पर जज किया जाना समाज की सोच पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

महिलाओं के प्रति दोहरा रवैया

विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं को अब भी पुरुषों की तुलना में अधिक व्यक्तिगत आलोचना और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। यह मामला उसी प्रवृत्ति का उदाहरण है, जहां प्रोफेशनल उपलब्धियों को नजरअंदाज कर बाहरी स्वरूप को मुद्दा बना दिया जाता है।

बुद्धिजीवियों की कड़ी प्रतिक्रिया

घटना के सामने आने के बाद कई बुद्धिजीवियों और जागरूक नागरिकों ने सोशल मीडिया पर इस तरह की बॉडी शेमिंग की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे न सिर्फ असभ्य, बल्कि एक खतरनाक सामाजिक प्रवृत्ति बताया है, जो डिजिटल स्पेस को विषाक्त बना रही है।

जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार की जरूरत

यह मामला एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का मंच जरूर है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। किसी भी व्यक्ति, विशेषकर सार्वजनिक सेवा में लगे अधिकारियों का मूल्यांकन उनके कार्य और योगदान के आधार पर होना चाहिए, न कि उनके रूप-रंग पर।

 

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