लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा तीन छात्रों को तत्काल प्रभाव से निष्कासित करने का निर्णय कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद, असहमति और छात्रों के अधिकारों की रक्षा का भी महत्वपूर्ण मंच है।
यदि किसी घटना में छात्रों की संलिप्तता पाई गई है, तो उन्हें अपना पक्ष रखने, निष्पक्ष सुनवाई प्राप्त करने और न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप अपील करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। आजीवन प्रवेश प्रतिबंध और परिसर में प्रवेश निषेध जैसी कठोर कार्यवाहियां तभी न्यायसंगत मानी जा सकती हैं, जब पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप हो।
हम विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग करते हैं कि जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, संबंधित छात्रों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए तथा किसी भी निर्णय में न्याय, पारदर्शिता और छात्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
लोकतंत्र में असहमति का उत्तर दमन नहीं, बल्कि संवाद होता है। विश्वविद्यालयों को भय का नहीं, बल्कि विचार-विमर्श, बहस और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का केंद्र बने रहना चाहिए।
