बॉलीवुड की एक चर्चित फिल्म का डायलॉग है— “नो एफआईआर, नो टॉक, फैसला ऑन द स्पॉट।” उत्तर प्रदेश में हाल के कई चर्चित अपराधों के बाद पीड़ित परिवारों और आम लोगों की ओर से भी कुछ ऐसी ही मांगें सुनाई देती हैं। सवाल यह है कि आखिर लोग न्यायिक प्रक्रिया के बजाय त्वरित कार्रवाई और एनकाउंटर की मांग क्यों करने लगे हैं? इस सवाल का जवाब अपराध के आंकड़ों और जनता की धारणा, दोनों में तलाशना होगा।
NCRB के आंकड़े क्या कहते हैं?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में दर्ज अपराधों की संख्या पिछले वर्षों में बढ़ी है। 2017 में राज्य में करीब 3.10 लाख अपराध दर्ज हुए थे। इसके बाद 2022 में यह संख्या 4 लाख के पार पहुंची और 2023 में 4.28 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए। NCRB की रिपोर्ट में हत्या, अपहरण, दुष्कर्म, चोरी, डकैती और अन्य संज्ञेय अपराध शामिल होते हैं। इन आंकड़ों को लेकर विपक्ष अक्सर योगी सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों पर सवाल उठाता है। उसका तर्क है कि यदि अपराध नियंत्रण में है तो दर्ज मामलों की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है।
सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार और पुलिस अधिकारियों का कहना है कि केवल दर्ज मामलों की संख्या देखकर कानून-व्यवस्था का आकलन नहीं किया जा सकता। उनका दावा है कि बेहतर एफआईआर पंजीकरण, ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था और पारदर्शी पुलिसिंग के कारण अधिक मामले दर्ज हो रहे हैं। हाल ही में यूपी पुलिस नेतृत्व ने भी महिला सुरक्षा, साइबर अपराध नियंत्रण और अपराध प्रबंधन में सुधार का दावा किया है।
फिर एनकाउंटर की मांग क्यों?
जब कोई जघन्य अपराध सामने आता है तो लोगों का गुस्सा केवल अपराधी पर नहीं, बल्कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया पर भी दिखाई देता है। पीड़ित परिवार अक्सर त्वरित न्याय चाहते हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक कई बार एनकाउंटर या कठोर कार्रवाई की मांग उठती है। हालांकि कानून विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय का अधिकार केवल अदालतों के पास है और किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
बहस का केंद्र क्या है?
एक तरफ बढ़ते अपराध पंजीकरण के आंकड़े हैं, दूसरी तरफ सरकार का दावा है कि गंभीर अपराधों की दर कई श्रेणियों में राष्ट्रीय औसत से कम है। यही विरोधाभास आज की सबसे बड़ी बहस बन गया है—क्या उत्तर प्रदेश में अपराध बढ़ रहे हैं, या फिर बेहतर रिपोर्टिंग के कारण आंकड़े बड़े दिखाई दे रहे हैं? और जब तक इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तब तक ‘ऑन द स्पॉट’ न्याय की मांग और कानून के शासन के बीच बहस जारी रहने वाली है।
