लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के यूरोलॉजी विभाग में सामने आए करीब 2.5 करोड़ रुपये के दवा घोटाले की जांच में नए और चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। जांच के दौरान विभाग की एक अलमारी से लगभग 15 लाख रुपये मूल्य की दवाएं बरामद की गई हैं, जिनमें अधिकांश कैंसर उपचार में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाएं शामिल हैं।
जांच रिपोर्ट के अनुसार जहां वास्तविक मरीजों को दवा और जांच रिपोर्ट के लिए 15 से 20 दिन तक इंतजार करना पड़ता था, वहीं फर्जी लाभार्थियों के नाम पर महंगी दवाएं महज 3 से 5 दिन में मंगा ली जाती थीं। कई मामलों में सामान्य मरीजों को कागजों पर कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का मरीज दिखाकर दवाओं की खरीद की गई। इतना ही नहीं, कुछ मृत मरीजों के नाम पर भी दवाएं मंगाने के आरोप सामने आए हैं।
जांच में पता चला है कि असाध्य रोग योजना के तहत पंजीकृत मरीजों के आयुष्मान कार्ड और UHID नंबर का कथित दुरुपयोग कर कैंसर, आयरन और प्रोटीन की दवाएं खरीदी गईं। आशंका जताई जा रही है कि मरीजों तक दवाएं पहुंचाने के बजाय उनकी कालाबाजारी की गई या उन्हें बाजार में बेच दिया गया।
जांच शुरू होने के बाद विभाग की अलमारी में रखी गई करीब 15 लाख रुपये की दवाओं का स्टॉक सामने आया। अधिकारियों ने दवाओं को जब्त कर स्टोर में जमा करा दिया है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ये दवाएं कब और किन मरीजों के नाम पर मंगाई गई थीं।
मामले में एक और गंभीर तथ्य सामने आया है कि कई कैंसर दवाओं को निर्धारित तापमान पर रखने के बजाय अलमारी में बंद रखा गया था। इससे दवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।
प्राथमिक जांच के आधार पर KGMU प्रशासन ने तीन संविदाकर्मियों को बर्खास्त कर दिया है, जबकि एक फार्मासिस्ट को निलंबित किया गया है। पांच सदस्यीय जांच समिति ने दवा खरीद और वितरण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच के बाद अनियमितताओं की पुष्टि की है।
KGMU के प्रवक्ता प्रो. केके सिंह के अनुसार घोटाले में शामिल कर्मचारियों ने फर्जी मरीजों की फाइलों पर “इमरजेंसी” का टैग लगाकर दवा खरीद प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया। इससे वास्तविक मरीजों की तुलना में फर्जी मामलों को प्राथमिकता मिलती रही।
उधर, मामले में बर्खास्त किए गए संविदाकर्मी सचिन कुमार तिवारी ने खुद को निर्दोष बताते हुए कुलपति को प्रार्थना पत्र सौंपा है। उनका कहना है कि उनकी जिम्मेदारी केवल रिकॉर्ड और दस्तावेज तैयार करने तक सीमित थी तथा दवा वितरण या उपचार प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।
इसी बीच KGMU के लारी कार्डियोलॉजी विभाग में एक मरीज को पांच स्टेंट लगाए जाने के मामले की भी जांच शुरू कर दी गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पांच सदस्यीय समिति गठित कर 15 मरीजों का रिकॉर्ड तलब किया है। समिति उपचार प्रक्रिया, स्टेंट लगाने की आवश्यकता और आयुष्मान योजना के तहत हुए इलाज की जांच करेगी।
