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आम के बगीचों में मधुमक्खी पालन से बढ़ रही किसानों की आय, 28 साल से शहद उत्पादन कर रहे सुनील कुमार

बिहार के नालंदा जिले के अस्थावां प्रखंड स्थित कोनंद गांव में आम के बगीचे इन दिनों केवल फलों की पैदावार के लिए ही नहीं, बल्कि शहद उत्पादन के लिए भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। यहां मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर थाना क्षेत्र के खेमायपट्टी गांव निवासी सुनील कुमार कुशवाहा आम के बगीचों को किराये पर लेकर बड़े पैमाने पर इटालियन प्रजाति की मधुमक्खियों का पालन कर रहे हैं। उनके इस प्रयास से न केवल शहद उत्पादन बढ़ रहा है, बल्कि स्थानीय किसानों को अतिरिक्त आय का नया स्रोत भी मिल रहा है।

सुनील कुमार बताते हैं कि वे पिछले 28 वर्षों से मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में उनके पास 800 से अधिक मधुमक्खी बक्से हैं, जिन्हें वे मौसम और फूलों की उपलब्धता के अनुसार विभिन्न राज्यों में ले जाकर स्थापित करते हैं। बिहार के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में भी वे मधुमक्खी पालन का कार्य करते हैं।

उन्होंने बताया कि अप्रैल से जुलाई तक मधुमक्खियां प्राकृतिक रूप से फूलों और पेड़-पौधों के रस से अपना भोजन प्राप्त करती हैं। इस दौरान आम के बगीचों में मधुमक्खियों की गतिविधियां काफी बढ़ जाती हैं। वहीं अगस्त और सितंबर के बाद जब प्राकृतिक स्रोत कम हो जाते हैं, तब मधुमक्खियों को चीनी का घोल देकर उनका पोषण किया जाता है, ताकि उनका विकास और शहद उत्पादन प्रभावित न हो।

सुनील कुमार के अनुसार आम के बगीचों में मधुमक्खी पालन करने से दोहरा लाभ मिलता है। एक ओर मधुमक्खियां आम के फूलों का परागण करती हैं, जिससे फलों की गुणवत्ता और उत्पादन में वृद्धि होती है, वहीं दूसरी ओर बेहतर गुणवत्ता वाला शहद भी प्राप्त होता है। आम के फूलों से तैयार शहद का स्वाद और सुगंध सामान्य शहद की तुलना में अधिक बेहतर मानी जाती है, जिसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है।

वे बताते हैं कि मधुमक्खी पालन से किसानों को अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर मिलता है। यदि किसान अपने बगीचों में मधुमक्खी पालन को अपनाएं तो उन्हें फलों की पैदावार बढ़ने के साथ-साथ शहद उत्पादन से भी लाभ मिल सकता है। इसी उद्देश्य से वे स्थानीय किसानों को मधुमक्खी पालन के प्रति जागरूक कर रहे हैं और उन्हें इसके वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी दे रहे हैं।

सुनील कुमार का कहना है कि मधुमक्खी पालन कम लागत में शुरू किया जा सकता है और इसमें रोजगार की भी अपार संभावनाएं हैं। वर्तमान में वे इस व्यवसाय से प्रतिवर्ष करीब आठ लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन को बढ़ावा दिया जाए तो किसानों की आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ कृषि उत्पादन में भी सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि मधुमक्खियां प्राकृतिक परागण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इनके कारण फसलों और फलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है। ऐसे में मधुमक्खी पालन किसानों के लिए एक लाभकारी सहायक व्यवसाय साबित हो सकता है, जो उन्हें “आम के आम, गुठलियों के दाम” वाली कहावत को वास्तविक अर्थों में चरितार्थ करने का अवसर देता है।

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