लखनऊ। राजधानी लखनऊ की जीवनरेखा कही जाने वाली गोमती नदी इन दिनों अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती नजर आ रही है। लगातार घटते जलस्तर और बढ़ते प्रदूषण ने नदी की स्थिति को बेहद चिंताजनक बना दिया है। कई स्थानों पर नदी का तल दिखाई देने लगा है और जगह-जगह मिट्टी के टीले उभर आए हैं।
गोमती बैराज के गेटों की मरम्मत के चलते पानी रोके जाने का असर भी नदी पर साफ दिखाई दे रहा है। पहले जहां नदी में पर्याप्त गहराई और प्रवाह नजर आता था, वहीं अब जलस्तर काफी नीचे पहुंच गया है। कुड़िया घाट, मेहंदी घाट और गोमती रिवर फ्रंट सहित कई स्थानों पर नदी का पानी दूषित हो चुका है।
शहर के कई नालों का गंदा पानी सीधे गोमती में गिर रहा है। इसके चलते नदी में कूड़ा-कचरा, बदबूदार पानी और गंदगी का अंबार दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कभी यह नदी स्वच्छ जल के लिए जानी जाती थी, लेकिन आज इसकी हालत नाले जैसी हो गई है।
रिवर फ्रंट पर मॉर्निंग वॉक करने पहुंचे रमेश चंद्र ने बताया कि सीवर का पानी लगातार नदी में गिरने से इसका प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से मछलियों और अन्य जलीय जीवों का जीवन संकट में पड़ गया है। उन्होंने सरकार से नदी की सफाई और संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की।
स्थानीय निवासी अजय ने कहा कि वर्षों पहले गोमती का जलस्तर इतना अधिक होता था कि लोग इसकी सुंदरता देखने दूर-दूर से आते थे। आज स्थिति यह है कि नदी में जगह-जगह कीचड़ और मिट्टी के टीले दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि यही हाल रहा तो नदी में प्रस्तावित स्टीमर संचालन भी सवालों के घेरे में आ जाएगा।
वहीं गंगा राम ने गोमती के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यह वही नदी है जिसके तट पर ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी। आज इसमें सीवर और गंदगी बह रही है, जो बेहद दुखद है। उन्होंने नागरिकों और प्रशासन से मिलकर गोमती को बचाने की अपील की।
स्थानीय लोगों का मानना है कि गोमती नदी का पुनर्जीवन और नियमित सफाई समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में नदी का अस्तित्व और अधिक संकट में पड़ सकता है।
