रिपोर्ट: अंकित पाण्डेय
सरिला (हमीरपुर)। पीली के डेरा में सोमवार को हुआ बिजली हादसा महज लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आरोप है कि सस्ते में काम कराने के लिए अकुशल श्रमिकों की जान जोखिम में डालकर हाईटेंशन लाइन पर काम कराया जा रहा है।
11 हजार वोल्ट की लाइन पर अकुशल श्रमिक क्यों?
नियमों के मुताबिक 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन पर काम प्रशिक्षित और अधिकृत लाइनमैन की निगरानी में होना चाहिए। इसके लिए सुरक्षा उपकरण, आवश्यक अनुमति और निर्धारित सुरक्षा प्रक्रिया का पालन जरूरी है। इसके बावजूद आरोप है कि सरिला में 30 वर्षीय पवन प्रजापति, जो विभाग में अकुशल श्रमिक के तौर पर काम करता है, उससे ट्रांसफार्मर का जंफर जुड़वाया जा रहा था।
ऐसे काम में मामूली चूक भी जानलेवा हो सकती है। इसके बावजूद पवन को खंभे पर चढ़ाकर काम कराने के आरोप ने विभागीय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शटडाउन का परमिट किसके नाम था?
पवन के चाचा रमेश का आरोप है कि शटडाउन अधिकृत लाइनमैन राजेंद्र शुक्ल के नाम पर लिया गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि जब कागजों में काम राजेंद्र के नाम था तो हाईटेंशन लाइन पर पवन को क्यों भेजा गया?
यह मामला विभाग में कथित तौर पर चल रही ऐसी व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जिसमें कागजों में जिम्मेदारी किसी और की होती है, जबकि जोखिम भरा काम दूसरे कर्मचारियों या निजी श्रमिकों से कराया जाता है।
एक लाइनमैन पर तीन फीडर का जिम्मा
ग्रामीणों का आरोप है कि राजेंद्र शुक्ल धौहल, कटेहरी और बंगरा समेत कई गांवों के तीन फीडरों की जिम्मेदारी अकेले संभाल रहे हैं। इतने बड़े क्षेत्र की जिम्मेदारी एक कर्मचारी पर होने से कार्य व्यवस्था और सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि विभागीय स्तर पर प्राइवेट और अकुशल युवकों से महज 3-4 हजार रुपये में काम कराया जाता है, जबकि सरकारी स्तर पर संबंधित कार्यों के लिए भुगतान की प्रक्रिया अलग है। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच की जरूरत है।
विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
एसडीओ हरिश्चंद्र वर्मा ने मामले में राजेंद्र शुक्ल की गलती मानते हुए जवाब मांगे जाने की बात कही है। वहीं अधीक्षण अभियंता ने जांच कराने की बात कही है। हालांकि, हादसे के बाद केवल जांच का आश्वासन दिए जाने से पीड़ित परिवार की चिंता खत्म नहीं होती।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर शटडाउन के दौरान बिजली आपूर्ति दोबारा बहाल हुई, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी थी और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं हुआ?
हादसे ने खड़े किए गंभीर सवाल
बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के अकुशल श्रमिक को 11 हजार वोल्ट की लाइन पर भेजे जाने के आरोप बेहद गंभीर हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि शटडाउन के दौरान लापरवाही से बिजली आपूर्ति बहाल की गई, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
ये हैं प्रमुख मांगें
- ठेका प्रथा और प्राइवेट श्रमिकों से हाईटेंशन लाइन पर काम कराने के आरोपों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
- लाइनमैन राजेंद्र शुक्ल के साथ उस एसएसओ की भूमिका की भी जांच हो, जिसने बिना उचित सत्यापन के बिजली आपूर्ति बहाल की।
- घायल पवन प्रजापति के इलाज का पूरा खर्च बिजली विभाग उठाए और उसे उचित मुआवजा दिया जाए।
- जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
