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अस्पताल के बाहर ही जिंदगी फंसी! KGMC के जाम में एंबुलेंस, व्यवस्था पर गंभीर सवाल

रिपोर्ट: न्यूज डेस्क, लखनऊ
लखनऊ। जिस अस्पताल में मरीज जिंदगी की आखिरी उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, अगर उसी अस्पताल के बाहर एंबुलेंस जाम में फंस जाए तो इसे महज ट्रैफिक की बदहाल व्यवस्था कहेंगे या मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़? लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (KGMC) से सामने आई तस्वीरें इसी गंभीर सवाल को खड़ा कर रही हैं। मेडिकल कॉलेज के बाहर से लेकर अंदर तक वाहनों की लंबी कतारें हैं, सड़क के दोनों तरफ अतिक्रमण का आरोप है और हालात ऐसे हैं कि एंबुलेंस तक जाम में फंसी नजर आ रही है।

एक छोर से दूसरे छोर तक जाम, एंबुलेंस भी फंसी

सामने आए वीडियो में KGMC के आसपास और परिसर में वाहनों की भारी भीड़ दिखाई दे रही है। वीडियो में एंबुलेंस भी जाम के बीच फंसी नजर आती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल इमरजेंसी मरीजों को लेकर उठ रहा है। अगर किसी गंभीर मरीज को लेकर एंबुलेंस अस्पताल पहुंच रही हो और रास्ते में उसे लंबा जाम मिल जाए, तो समय पर इलाज मिलने में देरी हो सकती है।

वीडियो साझा करने वाले व्यक्ति के मुताबिक, वह खुद भी काफी देर तक इसी जाम में फंसा रहा। दावा किया गया है कि वीडियो बनाए जाने के समय से लेकर उसे अपलोड किए जाने तक मेडिकल कॉलेज के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाम की स्थिति बनी रही।

बाहर सड़क पर अतिक्रमण, अंदर भी वाहनों की भीड़

वीडियो में मेडिकल कॉलेज के बाहर सड़क के दोनों तरफ अतिक्रमण होने का आरोप लगाया गया है। इससे सड़क पर वाहनों की आवाजाही प्रभावित होने की बात कही जा रही है। वहीं, परिसर के अंदर भी वाहनों की भीड़ और जाम की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

सवाल ये है कि जिस जगह हर मिनट किसी मरीज के लिए अहम हो सकता है, वहां एंबुलेंस के लिए रास्ता कितना सुरक्षित और सुगम है?

स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस से सवाल

जहां शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े दावे और वादे किए जाते हैं, वहीं KGMC के बाहर की तस्वीर उन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। जिस रास्ते पर हर मिनट जिंदगी बचाने वाली एंबुलेंस को अस्पताल तक पहुंचना चाहिए, वहां अगर वह जाम में रेंगने या फंसने को मजबूर हो, तो सवाल सिर्फ ट्रैफिक का नहीं, पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता और जवाबदेही का है।

सोचिए, अगर इसी जाम में किसी गंभीर मरीज की एंबुलेंस 10-15 मिनट नहीं, बल्कि उससे भी ज्यादा देर फंस गई तो? उस देरी की कीमत कौन चुकाएगा? मरीज, उसका परिवार या फिर जिम्मेदार विभाग?

बड़े-बड़े दावों के बीच KGMC की यह तस्वीर एक सीधा सवाल पूछ रही है—जब अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता ही जाम है, तो आखिर किस ट्रैफिक व्यवस्था की बात की जा रही है?

बृजेश पाठक के निरीक्षण पर भी सवाल

डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक समय-समय पर अस्पतालों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लेते हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या KGMC के भीतर की व्यवस्थाओं के साथ-साथ अस्पताल के बाहर की ट्रैफिक और अतिक्रमण की समस्या भी मंत्री जी की नजर में आएगी, या फिर इस बदहाल व्यवस्था को देखकर भी आंखें बंद कर निकल जाएंगे?

क्योंकि अस्पताल की व्यवस्था सिर्फ चार दीवारों के भीतर नहीं होती। मरीज को समय पर अस्पताल के गेट तक पहुंचाना भी स्वास्थ्य व्यवस्था का ही अहम हिस्सा है। जब जिंदगी बचाने वाली एंबुलेंस ही अस्पताल के बाहर जाम में फंस जाए, तो यह तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक जाम का नहीं… सवाल उस एंबुलेंस का है, जिसमें कोई मरीज जिंदगी की आखिरी उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंच रहा है।और अगर उसी उम्मीद को रास्ते का जाम रोक दे… तो फिर सवाल सिर्फ ट्रैफिक का नहीं, जवाबदेही का बन जाता है।

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