राजेन्द्र सिहं
लखनऊ। बार पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन की आंधी की आहट पहले चरण के मतदान से ही आने लगी थी। चुनाव आयोग की निष्पक्ष, सख्त कार्यप्रणाली और केंद्रीय सुरक्षा बलों की निगरानी में हुए मतदान ने इतिहास रच दिया।
राज्य में दो चरणों में हुई वोटिंग में कुल मतदान प्रतिशत 92.47 प्रतिशत रहा। जो भारत की स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल में हुए किसी भी चुनाव में अब तक का सबसे अधिक है।
इसके साथ ही भाजपा ने पहली बार पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल की है, जो उसके लिए काफी मायने रखती है।
क्योंकि भाजपा की पूर्ववर्ती संघ के संस्थापक रहे डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की यह धरती है, इस लिहाज से पश्चिम बंगाल की जीत भाजपा के लिए दशकों पुरानी हसरत पूरी होने जैसी है और वैचारिक सफलता है।
इसके अलावा बंगाल की जीत के साथ ही गंगोत्री से गंगासागर तक वाला भाजपा का नारा भी पूरा हो गया।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की छवि एक समय सफेद साड़ी में योद्धा जैसी थीं, उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी राष्ट्रीय तृणमूल कांग्रेस के लिए ‘मां, माटी, मानुष‘ का नारा गढ़ा और 2011 के विधानसभा चुनाव में 34 साल पुरानी वाम सरकार को पश्चिम बंगाल से उखाड़ फेंका। ममता का यह नारा वर्ष 2016 और 2021 के चुनाव में भी असरदार रहा।
लेकिन पिछले पांच साल के अंदर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अहंकार, उनका अड़ियल रवैया, राज्य में बढ़ रहे भ्रष्टाचार, महिला अत्याचार, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) कार्यकर्ताओं की गुंडई और मुस्लिमों पर विशेष ‘ममता’ और अराजक तत्वों को खुली छूट से ममता बनर्जी की छवि बंगाल के संपूर्ण हिन्दू समाज में एक खलनायक जैसी बनी।
अगस्त 2024 में पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल 31 वर्षीय महिला पीजीटी डॉक्टर के साथ बर्बर तरीके से बलात्कार के बाद हत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसमें टीएमसी के ही एक नेता का नाम सामने आया था। ऐसी कई घटनाओं ने बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये थे।
वर्ष 2011 में सफेद साड़ी में लिपटी ममता बनर्जी के कटआउट और पोस्टर ने उनकी ईमानदार और जुझारू महिला नेता की जो छवि गढ़ी थी, 2026 आते-आते कई बड़े भ्रष्टाचार और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं ने उसे तगड़ा धक्का दिया।
वर्ष 2022 का स्कूल सेवा आयोग (SSC) भर्ती घोटाला, सारदा और रोज वैली जैसे पोंजी स्कीम घोटालों में निवेशकों के करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं। राज्य में निर्माण और व्यापारिक गतिविधियों में ‘सिंडिकेट राज’ और अवैध वसूली (तोलबाज़ी) के आरोप अक्सर लगते रहे, जिससे स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है।
इसके अलावा कोयला तस्करी, मवेशी तस्करी, राशन घोटाला और बालू खनन माफिया से जुड़े मामले भी जांच के घेरे में रहे।
इन घोटालों की जांच और केंद्रीय एजेंसियों के काम में ममता बनर्जी ने जमकर अड़ंगा लगाया।
फरवरी 2019 में सारदा और रोज वैली चिट फंड घोटालों की जांच के लिए कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर पहुंची सीबीआई (CBI) टीम को ममता बनर्जी ने रोक दिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने घोटालों की सीबीआई जांच को संघीय ढांचे पर हमला बताते हुए मेट्रो चैनल पर धरना दिया।
2026 के चुनाव से ठीक पहले बंगाल में चुनाव आयाेग द्वारा कराये गए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में याचिका दायर कर चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
1 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में कालियाचक-II ब्लॉक कार्यालय में (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान तीन महिला जजों समेत सात न्यायिक अधिकारियों को भीड़ ने 9 घंटे से अधिक समय तक बंधक बनाए रखा।
भीड़ ने वाहनों में तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की, सूचना देने के बावजूद राज्य की पुिलस ने मामले कार्रवाई नहीं की। बाद में सुप्रीम कोर्ट के जज के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय बलों ने उन्हें छुड़ाया।
5 जनवरी 2024 को उत्तर 24 परगना जिले के संदेशखली में टीएमसी नेता शाहजहां शेख के घर पर छापेमारी करने गई प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम पर भीड़ ने हमला कर दिया था।
ऐसी ही कितनी घटनाएं हैं, जिनसे ऐसा लगने लगा था कि जैसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को देश के संघीय ढांचे से अलग कर वहां अपनी मनमर्जी और तानाशाही का राज स्थापित करना चाहती हों।
केंद्र सरकार के साथ टकराव के अलावा बहुसंख्यक हिन्दू समाज का उत्पीड़न और बांग्लादेशी, रोहिंग्या के मुद्दे पर ममता सवालों में रहीं। इस बार के चुनाव में भाजपा ने प्रचार अभियान में ममता के मां, माटी और मानुष के जवाब में नारा दिया कि आज ‘मां’ रो रही है, ‘माटी’ असुरक्षित है और ‘मानुष’ भयभीत हैं।
पार्टी ने टीएमसी के नारे को उसके मुस्लिम प्रेम, महिला असुरक्षा और ममता की विफलता का नैरेटिव बना दिया। जिसका असर 4 मई को आए चुनाव परिणाम में साफ दिखा।
टीएमसी को लेकर जनता में नाराजगी का ही परिणाम है कि ममता बनर्जी खुद भवानीपुर से अपनी सीट पर जीत हािसल नहीं कर सकीं। भाजपा ने अद्भुद, अकल्पनीय और अविश्वसनीय जीत हासिल कर अब 9 मई को यहां सरकार बनाने जा रही है।
राज्य की 294 सीटों में भाजपा ने जहां 207 सीटों पर जीत दर्ज की, वहीं टीएमसी मात्र 80 सीटों पर सिमट गई।
इतनी करारी हार के बावजूद ममता की अकड़ कम नहीं हुई है। जनादेश को स्वीकार करने के बजाय वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं।
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है। और कई समाचार पत्रों के संपादक रहें हैं।)*
