इस साल देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई, शनिवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार, यह व्रत आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है और देवशयनी एकादशी की व्रत कथा सुनने का विशेष महत्व माना गया है।
मान्यता है कि व्रत कथा का श्रवण करने से व्यक्ति के पाप और कष्ट दूर होते हैं तथा भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बार एकादशी तिथि 24 जुलाई सुबह 9:12 बजे से 25 जुलाई सुबह 11:34 बजे तक रहेगी। व्रत का पारण 26 जुलाई सुबह 5:39 बजे से 8:22 बजे के बीच किया जा सकेगा। इस दिन ब्रह्म योग और ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग रहेगा।
देवशयनी एकादशी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ शुक्ल एकादशी के व्रत की विधि और महिमा बताने का अनुरोध किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसकी महिमा का वर्णन स्वयं ब्रह्मा जी ने नारद मुनि से किया था।
कथा के अनुसार, सतयुग में राजा मांधाता का शासन था। उनकी प्रजा सुखी और समृद्ध थी। एक समय उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक भयंकर अकाल पड़ा। बारिश न होने के कारण पूरे राज्य में हाहाकार मच गया। खेती प्रभावित हो गई और धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, हवन, पूजा-पाठ और अन्य मांगलिक कार्य भी बाधित होने लगे।
प्रजा की परेशानी देखकर राजा मांधाता बेहद चिंतित हो गए। वे इस समस्या का समाधान खोजने के लिए अपनी सेना के साथ जंगल की ओर निकल पड़े। वहां उन्हें अंगिरा ऋषि का आश्रम दिखाई दिया। राजा ने ऋषि को प्रणाम कर राज्य में पड़े अकाल की समस्या बताई और इससे मुक्ति का उपाय पूछा।
अंगिरा ऋषि ने राजा से कहा कि सतयुग में छोटे से छोटे पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। उन्होंने अकाल से मुक्ति के लिए राजा को आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी का व्रत रखने और भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करने की सलाह दी। साथ ही रात में जागरण करने और अगले दिन दान-पुण्य के बाद व्रत का पारण करने को कहा।
राजा मांधाता ने ऋषि की बात मानकर देवशयनी एकादशी का व्रत रखा और भगवान विष्णु की पूजा की। इसके बाद उन्होंने विधि-विधान से दान किया और पारण किया। व्रत के पुण्य प्रभाव और भगवान विष्णु की कृपा से राज्य में जमकर बारिश हुई और भयंकर अकाल समाप्त हो गया।
बारिश होने के बाद राज्य में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई। खेत लहलहा उठे और राज्य धन-धान्य से भर गया। तभी से देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु की आराधना और व्रत के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।
