लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट के दुबग्गा डिपो में कार्यरत संविदा परिचालकों का निजी कंपनी में विलय किए जाने के फैसले के खिलाफ विरोध लगातार तेज हो रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने महाकुंभ से लेकर श्रीराम मंदिर दर्शन व्यवस्था तक हर जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई, लेकिन अब उन्हें एक निजी कंपनी के अधीन भेजा जा रहा है, जिससे उनकी नौकरी और भविष्य दोनों असुरक्षित हो गए हैं।
परिचालकों के अनुसार, 2021 में संविदा पर भर्ती होने के बाद उन्होंने कभी किसी प्रकार की मांग नहीं रखी। उनका आरोप है कि अचानक उन्हें संदेश भेजकर बताया गया कि उनका विलय निजी कंपनी एसएस इंटरप्राइजेज में किया जा रहा है। जब उन्होंने इस फैसले का विरोध किया तो कथित तौर पर उन्हें कहा गया कि “काम करना है तो करो, वरना बैग उठाकर निकल जाओ।”

8 दिनों से जारी है आंदोलन
दुबग्गा डिपो के संविदा परिचालक पिछले आठ दिनों से कार्य बहिष्कार और प्रदर्शन कर रहे हैं। पहले उन्होंने डिपो परिसर में विरोध प्रदर्शन किया, फिर हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा पर धरना दिया। 2 जून को चार कर्मचारियों ने लालबत्ती चौराहे पर खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह की कोशिश भी की, हालांकि पुलिस ने समय रहते उन्हें रोक लिया। फिलहाल सभी कर्मचारी इको गार्डन में धरना दे रहे हैं।
शादी टूटने का दर्द
परिचालक शुभम पटेल ने बताया कि संविदा कर्मचारी रहते हुए उनकी शादी तय हुई थी, लेकिन निजी कंपनी में विलय की खबर सामने आने के बाद रिश्ता टूट गया। उनका कहना है कि लड़की पक्ष ने नौकरी की अस्थिरता को कारण बताते हुए विवाह से इनकार कर दिया। शुभम के मुताबिक, उन्होंने अभी तक अपने परिवार को भी पूरी स्थिति नहीं बताई है।

‘5 साल सेवा दी, अब नकारा जा रहा’
परिचालक सत्येंद्र का कहना है कि 2021 से लगातार सेवाएं देने के बावजूद कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व चर्चा के निजी कंपनी के अधीन किया जा रहा है। उनके अनुसार, 13 मई और 18 मई को मिले संदेशों से उन्हें इस निर्णय की जानकारी हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि कर्मचारियों की आपत्तियों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
‘जवानी का सबसे अच्छा समय नौकरी में दिया’
अयोध्या निवासी परिचालक रोहित पांडे ने कहा कि उन्होंने महाकुंभ और राम मंदिर उद्घाटन जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों में दिन-रात काम किया। उनका कहना है कि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष संविदा नौकरी में बिताने के बाद अब उन्हें असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले तीन महीने से वेतन का भुगतान नहीं हुआ है।
निजी कंपनी में भविष्य को लेकर चिंता
बाराबंकी के पंकज यादव का कहना है कि निजी कंपनियों में नौकरी की स्थिरता नहीं होती। कर्मचारियों को कभी भी हटाया जा सकता है और भविष्य में स्थायी नियुक्ति या पदोन्नति जैसी संभावनाएं भी सीमित हो जाती हैं। उनका मानना है कि संविदा व्यवस्था में कम से कम भविष्य में स्थायी होने की उम्मीद बनी रहती है।
200 से अधिक परिचालक प्रभावित
जानकारी के अनुसार, शुरुआत में 326 परिचालकों की भर्ती हुई थी, जिनमें से कुछ कर्मचारी नौकरी छोड़ चुके हैं। वर्तमान में लगभग 200 परिचालक सेवाएं दे रहे हैं और शहर की 120 बसों के संचालन में योगदान कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि यदि निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया गया तो उनके सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा।
किलोमीटर के हिसाब से मिलता है भुगतान
प्रदर्शनकारी परिचालकों के अनुसार उन्हें ₹2.60 प्रति किलोमीटर की दर से भुगतान मिलता है। एक परिचालक औसतन प्रतिदिन करीब 180 किलोमीटर की ड्यूटी करता है। हड़ताल के कारण कई रूटों पर परिचालन प्रभावित हुआ है और कुछ स्थानों पर चालक ही टिकट जारी करने का काम भी कर रहे हैं।
संविदा परिचालकों की मांग है कि उन्हें निजी कंपनी में भेजने के बजाय रोडवेज व्यवस्था में समायोजित किया जाए और उनकी नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। फिलहाल सभी की निगाहें प्रशासन और परिवहन विभाग के अगले फैसले पर टिकी हैं।
