उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नगर निगम से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी मामला सामने आया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने मेयर Sushma Kharkwal के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से सीज कर दिए हैं। यह कार्रवाई फैजुल्लागंज वार्ड-73 से जुड़े पार्षद शपथ विवाद में बार-बार अदालत के आदेशों की अवहेलना के बाद की गई है।
कोर्ट का सख्त रुख
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक ललित किशोर तिवारी को पार्षद पद की शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर कोई भी प्रशासनिक या वित्तीय निर्णय नहीं ले सकेंगी। इस दौरान नगर निगम के सभी महत्वपूर्ण कार्यों का संचालन जिलाधिकारी और नगर आयुक्त के जिम्मे रहेगा।कोर्ट ने यह आदेश जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस एसक्यूएच रिजवी की पीठ ने पारित किया।
पूरा मामला क्या है?
यह विवाद वार्ड-73 के पार्षद पद से जुड़ा है। चुनाव न्यायाधिकरण ने दिसंबर 2025 में भाजपा पार्षद प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन रद्द कर सपा प्रत्याशी ललित किशोर तिवारी को विजेता घोषित किया था।
ललित तिवारी को शपथ नहीं दिलाई गई
लगातार कोर्ट के आदेशों की अवहेलना हुई
मामला हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिका खारिज कर ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया।
दिसंबर 2025: ट्रिब्यूनल ने ललित तिवारी को विजेता घोषित किया
मार्च 2026: शपथ न दिलाने पर हाई कोर्ट में याचिका
13 मई 2026: कोर्ट का एक हफ्ते में शपथ का आदेश
20 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट में अपील वापस
21–22 मई 2026: हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया
ताज़ा आदेश: मेयर के सभी प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार सीज
नगर निगम की स्थिति
कोर्ट के आदेश के बाद नगर निगम की सभी अहम जिम्मेदारियाँ:
- जिला प्रशासन (DM)
- नगर आयुक्त
को सौंप दी गई हैं ताकि प्रशासनिक कामकाज प्रभावित न हो।
कानूनी लड़ाई और खर्च का अनुमान
इस पूरे विवाद में ट्रिब्यूनल से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक भारी कानूनी खर्च हुआ बताया जा रहा है। अनुमान के मुताबिक यह राशि 40 से 70 लाख रुपये तक पहुंच सकती है, जिसमें वरिष्ठ वकीलों की फीस, दस्तावेजी कार्य और अन्य कानूनी खर्च शामिल हैं। ललित किशोर तिवारी ने कहा कि यह फैसला संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जीत है।
वहीं मेयर ने कहा कि उन्हें कोर्ट के आदेश की जानकारी नहीं थी, लेकिन वे उसका पालन करेंगी।
राजनीतिक असर
इस आदेश को लखनऊ नगर निगम इतिहास का एक असामान्य और बेहद गंभीर मामला माना जा रहा है, जिसमें पहली बार किसी मेयर के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार इस तरह से सीज किए गए हैं।
