न्यूज डेस्क, मेरठ
मेरठ। कांवड़ यात्रा अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। हरिद्वार से गंगाजल लेकर मेरठ के रास्ते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे शिवभक्तों के साथ सड़कों पर आस्था के अनगिनत रंग दिखाई दे रहे हैं। इस बार सबसे खास आकर्षण जेन-जी की क्रिएटिविटी बनी है। नई पीढ़ी ने आधुनिक सोच और तकनीक के सहारे विशाल कांवड़ों को चलती-फिरती कहानी और संदेशों के मंच में बदल दिया है।

युवाओं ने बड़ी कांवड़ों के जरिए सनातन संस्कृति, भारतीय इतिहास, विज्ञान, देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों को सामने रखा है। इन आकर्षक कांवड़ों के निर्माण पर युवाओं ने लाखों रुपये खर्च किए हैं। कुछ कांवड़ों की लागत 25 लाख रुपये तक बताई जा रही है।
योगी सरकार की ओर से कांवड़ मार्गों पर की गई व्यवस्थाओं के बीच श्रद्धालुओं का उत्साह भी देखने को मिल रहा है। विशाल कांवड़ें राहगीरों का ध्यान खींच रही हैं। इनमें भगवान शिव के रौद्र रूप, नटराज स्वरूप, तांडव नृत्य, देवी पार्वती का मां काली रूप और रुद्र अवतार हनुमान जैसी झांकियां खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

आस्था के साथ विज्ञान और देशभक्ति का संदेश
कांवड़ पथ पर केदारनाथ की प्रतिकृति आस्था का संदेश देती नजर आई, तो भारत माता और अग्नि-5 की प्रतिकृति वाली कांवड़ों ने देशभक्ति और विज्ञान की झलक दिखाई। वुडन, चारकोल और अन्य सामग्रियों से तैयार विशाल कांवड़ों में समाज के अलग-अलग रंग भी देखने को मिले।
कई तीर्थस्थलों की झांकियों को इतनी जीवंतता के साथ तैयार किया गया है कि कांवड़ मार्ग से गुजरने वाले लोग उन्हें देखने के लिए रुक जाते हैं।
गुमनाम शहीदों को भी दी जगह
जेन-जी की कांवड़ों की खासियत सिर्फ धार्मिक झांकियों तक सीमित नहीं है। युवाओं ने भारतीय इतिहास में गुमनाम रह गए शहीदों और जननायकों को भी अपनी कांवड़ों का हिस्सा बनाया है।
दिल्ली के करोलबाग की एक झांकी 1857 के जननायक मातादीन वाल्मीकि को समर्पित रही। वहीं दिल्ली के तिगरी क्षेत्र के युवाओं ने भगवान शिव के साथ दादा सबल सिंह और दादा केसर सिंह की जीवनगाथा को झांकी के जरिए प्रस्तुत किया। इसका निर्माण 25 सदस्यीय वाल्मीकि युवा शक्ति ग्रुप ने किया।

कांवड़ के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
कई युवाओं ने कांवड़ यात्रा को पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकता से भी जोड़ा है। दिल्ली निवासी सोनू ने अपनी 225 किलोमीटर की यात्रा पर्यावरण संरक्षण को समर्पित की। वह हरिद्वार से गंगाजल के साथ 1100 पौधे लेकर चले और दिल्ली तक लोगों को इन पौधों का वितरण भोले के प्रसाद के रूप में किया।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए उन्होंने अपने वाहन और वेशभूषा को भी हरे रंग और ग्रीन ग्रास की थीम में तैयार किया।

आस्था के साथ आधुनिक सोच का संगम
इन विशाल कांवड़ों के निर्माण में युवाओं ने लाखों रुपये खर्च किए हैं। जेन-जी की यह पहल दिखाती है कि तकनीक और आधुनिक जीवनशैली के बीच भी नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई है।
कांवड़ मार्ग पर नजर आ रही ये अनूठी झांकियां सिर्फ आकर्षण का केंद्र नहीं हैं, बल्कि आस्था, इतिहास, विज्ञान, पर्यावरण और सामाजिक संदेशों के नए संगम की कहानी भी कह रही हैं।
