पहलगाम में हुए आतंकी हमले को एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन उस दर्दनाक घटना की यादें आज भी पीड़ित परिवारों के दिलों में ताजा हैं। समय भले आगे बढ़ गया हो, मगर जिन लोगों ने अपने अपनों को खोया, उनके लिए जिंदगी वहीं ठहर गई है।
ऐसी ही एक कहानी बेंगलुरु की रहने वाली डॉ. सुजाता की है, जिन्होंने इस हमले में अपने पति भरत भूषण को खो दिया। एक साल बाद भी वह उस दिन को भूल नहीं पाई हैं। उनके मुताबिक, जिंदगी अब दो हिस्सों में बंट चुकी है—‘पहले’ और ‘बाद’।
डॉ. सुजाता बताती हैं कि उनके पति न सिर्फ उनके जीवन साथी थे, बल्कि भावनात्मक सहारा भी थे। उन्होंने कहा, “उनके जाने के बाद अब सिर्फ खालीपन रह गया है। मेरी मुस्कान और भावनाएं जैसे कहीं खो गई हैं।” MBA ग्रेजुएट भरत भूषण उनके जीवन में संतुलन बनाए रखते थे—वह दुनिया को समझते थे और सुजाता अपने मरीजों को।
बेटे की आंखों के सामने हुई घटना
इस हमले की सबसे दर्दनाक बात यह रही कि उनके छोटे बेटे ने अपने पिता को गोली लगते हुए अपनी आंखों से देखा। उस समय वह महज साढ़े चार साल का था। डॉ. सुजाता ने बताया, “हम दोनों के कपड़ों पर खून के छींटे थे और वह बार-बार कह रहा था—‘पापा को चोट लगी है, बहुत खून बह रहा है।’”
आज भी वह बच्चा उस घटना को पूरी तरह भूल नहीं पाया है। उसकी मासूम यादें एक मां के लिए सुकून भी देती हैं और चिंता भी बढ़ाती हैं।
खुद को व्यस्त रखकर संभाल रहीं जिंदगी
डॉ. सुजाता बताती हैं कि इस गहरे सदमे से उबरने के लिए वह खुद को सुबह से रात तक काम में व्यस्त रखती हैं। खाली समय मिलते ही उस भयावह दिन की यादें उन्हें परेशान करने लगती हैं।
अपने बेटे के लिए उन्होंने रविवार का दिन पूरी तरह खाली रखा है। वह उसके साथ समय बिताती हैं, खेलती हैं और पढ़ाती हैं, ताकि वह इस सदमे से धीरे-धीरे बाहर निकल सके।
खुशियों का महीना बना दर्द की याद
अप्रैल का महीना, जो पहले उनके परिवार के लिए खुशियों का समय होता था, अब गम की याद दिलाता है। हमले से कुछ दिन पहले ही 14 अप्रैल को परिवार ने भरत भूषण का जन्मदिन मनाया था।
डॉ. सुजाता का कहना है कि इस तरह की घटनाएं सिर्फ एक व्यक्ति की जान नहीं लेतीं, बल्कि पूरे परिवार की खुशियां छीन लेती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे हमलों के पीछे लोगों का ब्रेनवॉश किया जाता है, जिससे वे गलत को सही समझ बैठते हैं, जबकि हकीकत में यह पूरी तरह अमानवीय है।
