नई दिल्ली/लखनऊ। छोटे बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम अब चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र में मोबाइल फोन का अधिक इस्तेमाल बच्चों के मानसिक विकास पर असर डाल सकता है और ऑटिज्म जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है।
AIIMS की एक रिसर्च के मुताबिक, जन्म से 18 महीने तक जिन बच्चों को नियमित रूप से मोबाइल स्क्रीन दिखाई जाती है, उनमें विकास संबंधी दिक्कतें और ऑटिज्म के लक्षण अधिक देखे गए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस उम्र में बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित होता है, ऐसे में ज्यादा स्क्रीन टाइम उनके व्यवहार और सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
क्या है ऑटिज्म?
ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जिसमें बच्चे के बोलने, समझने और सामाजिक व्यवहार पर असर पड़ता है। अगर बच्चा 2–3 साल की उम्र तक बोलने में देरी करता है या सामान्य बातों को समझने में परेशानी होती है, तो इसे ऑटिज्म के शुरुआती संकेत माना जा सकता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
AIIMS के न्यूरोलॉजी विभाग की वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. शेफाली गुलाटी के अनुसार, बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर स्पष्ट गाइडलाइंस का पालन करना जरूरी है।
- जन्म से 18 महीने तक बच्चों को मोबाइल फोन बिल्कुल न दें
- 18 महीने से 6 साल तक स्क्रीन टाइम को अधिकतम 1 घंटे तक सीमित रखें
क्यों जरूरी है कंट्रोल?
विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल से बच्चे शारीरिक रूप से कम सक्रिय हो जाते हैं और उनकी सामाजिक व मानसिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं। कम स्क्रीन टाइम रखने से बच्चे अधिक एक्टिव रहते हैं और उनके समग्र विकास में मदद मिलती है।
इलाज कैसे होता है?
ऑटिज्म का इलाज बच्चे की स्थिति के अनुसार किया जाता है। डॉक्टर जांच के बाद थेरेपी, बिहेवियरल ट्रीटमेंट और जरूरत पड़ने पर दवाइयों की सलाह देते हैं। समय रहते पहचान और सही इलाज से बच्चे की स्थिति में सुधार संभव है।
