राजकीय अभिलेखागार में बुधवार को वर्ष 1794 की एक दुर्लभ पांडुलिपि प्रदर्शित की गई, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों का वर्णन किया गया है। खास बात यह रही कि पांडुलिपि में करीब 400 आकर्षक चित्र भी शामिल हैं। प्रत्येक पृष्ठ पर दोहा और चौपाई के साथ चित्रों का विस्तृत विवरण अंकित है।
कार्यक्रम के दौरान ऐसी कई प्राचीन पांडुलिपियों के बारे में लगभग 250 छात्र-छात्राओं को प्रशिक्षण दिया गया। इनमें से 100 विद्यार्थियों को 15 दिनों के लिए “पांडुलिपि मित्र” के रूप में चुना जाएगा, जो राष्ट्रीय सर्वेक्षण कार्यक्रम के तहत कार्य करेंगे।
अभिलेखागार में ज्ञानभारतम् मिशन के अंतर्गत आयोजित “पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला” में भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास और प्राचीन धरोहरों के संरक्षण पर विशेष प्रशिक्षण दिया गया।
मुख्य अतिथि पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात ने कहा कि ज्ञानभारतम् मिशन के जरिए देश लगभग एक करोड़ पांडुलिपियों के संग्रह और संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि अब ऐसा मजबूत तंत्र विकसित हो चुका है, जिससे आम लोग भी अपनी पारिवारिक और निजी पांडुलिपियों को सुरक्षित रख सकते हैं।
विशिष्ट अतिथि बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के आधुनिक भारतीय इतिहास विभाग के सह-प्राध्यापक डॉ. सुशील कुमार पांडेय ने कहा कि वर्तमान समय की कई चुनौतियों का समाधान भारतीय ज्ञान परंपरा में मौजूद है और पांडुलिपियां हमारी बौद्धिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं।
कार्यक्रम में वर्ष 1967 की एक अन्य पांडुलिपि भी प्रदर्शित की गई, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े सात सुंदर चित्रों के साथ भगवद्गीता के सभी 700 श्लोक संकलित हैं।
दूसरे सत्र में डॉ. वंदना सिंह ने ज्ञानभारतम् पोर्टल, मोबाइल एप और पांडुलिपि सर्वेक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं।
