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I-PAC से दूरी: क्या 2027 का डर सता रहा है अखिलेश यादव को?

न्यूज डेस्क – प्रिया बाजपेई शुक्ला

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनावी रणनीति बनाने वाली कंपनी I-PAC से अपनी डील खत्म कर दी है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले लिया गया यह फैसला अब सियासी हलकों में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।

इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—

क्या वाकई समाजवादी पार्टी के पास फंड की कमी है?या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक रणनीति काम कर रही है?क्योंकि सवाल सिर्फ पैसों का नहीं है…सवाल है भरोसे का… और शायद सियासी जोखिम का भी फंड की कमी का दावा, लेकिन उठे कई बड़े सवाल—क्या बदली रणनीति, भरोसे का संकट या हालिया चुनावी नतीजों का असर

फंड की कमी या रणनीतिक बदलाव?

लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने साफ तौर पर कहा कि पार्टी के पास इतना बजट नहीं है कि वह I-PAC जैसी हाई-प्रोफाइल चुनावी कंसल्टेंसी को जारी रख सके। उन्होंने यह भी माना कि कुछ महीनों तक दोनों के बीच काम हुआ, लेकिन अब यह साझेदारी आगे नहीं बढ़ रही।

लेकिन राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ “फंड की कमी” का मामला मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि चुनाव से पहले इस तरह का बड़ा फैसला आमतौर पर कई स्तरों पर सोच-समझकर लिया जाता है।

I-PAC का ट्रैक रिकॉर्ड और बदलती धारणा

I-PAC की स्थापना चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने की थी। यह देश की पहली बड़ी प्रोफेशनल पॉलिटिकल कंसल्टेंसी मानी जाती है, जिसने चुनावी कैंपेनिंग को डेटा और टेक्नोलॉजी से जोड़ दिया।

इस कंपनी ने पहले कई चुनावों में सफलता दिलाई

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और एम.के. स्टालिन की डीएमके इसके प्रमुख उदाहरण हैं। हालांकि हालिया चुनावी नतीजों के बाद I-PAC की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं। खासकर पश्चिम बंगाल के परिणामों ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या अब यह “विजय मशीन” पहले जैसी असरदार नहीं रही?

क्या बंगाल के नतीजों का असर?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने अखिलेश यादव के फैसले को प्रभावित किया । क्या उन्हें यह लगा कि अगर I-PAC के साथ डील जारी रही, तो 2027 में यूपी में भी जोखिम बढ़ सकता है?

क्या यह फैसला संभावित नुकसान से बचने के लिए पहले से किया गया “डैमेज कंट्रोल” है?

हालांकि, इस तरह के सवालों पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन टाइमिंग जरूर इन अटकलों को हवा देती है।

कानूनी और राजनीतिक जोखिम भी कारण?

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, I-PAC से जुड़े कुछ कानूनी मामले और जांच भी सपा के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं। ऐसे में पार्टी किसी भी संभावित विवाद से दूरी बनाकर चलना चाहती है। इसके अलावा, चुनावी रणनीति की गोपनीयता भी एक बड़ा मुद्दा है। बड़े चुनावों में डेटा, प्लानिंग और रणनीति का लीक होना किसी भी पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

अब नई रणनीति क्या होगी

सूत्रों के अनुसार, समाजवादी पार्टी अब मल्टी-लेयर रणनीति पर काम कर रही है।डेटा एनालिसिस, सर्वे और कैंपेन मैनेजमेंट के लिए अलग-अलग कंपनियों के साथ-साथ इन-हाउस टीम को मजबूत किया जा रहा है।

इसका मतलब साफ हैअब सपा किसी एक एजेंसी पर निर्भर रहने के बजाय पूरा कंट्रोल खुद अपने हाथ में रखना चाहती है।राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने चुनावी सिस्टम और एजेंसियों पर सवाल उठाते हुए तंज भी कसा। उन्होंने कहा कि आज के समय में चुनाव जीतने के लिए अलग-अलग कंपनियों से सर्वे, डेटा और सोशल मीडिया मैनेजमेंट कराया जाता है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं और इस पर गंभीर चर्चा की जरूरत है।

2027 का सीधा मुकाबला गौरतलब है कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में मुकाबला सीधे तौर पर अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच माना जा रहा है।ऐसे में I-PAC से दूरी बनाना सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट खत्म करना नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

आखिर संदेश क्या है?अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह फैसला दूरदर्शी रणनीति का हिस्सा है?या हालिया चुनावी नतीजों और बदलते माहौल के बीच लिया गया एहतियाती कदम?क्योंकि राजनीति में हर फैसला सिर्फ उस वक्त के लिए नहीं होता…कई बार वह आने वाले चुनावों की पूरी दिशा तय करता है।

अब नजरें 2027 पर हैं—

जहां यह साफ होगा कि I-PAC से दूरी बनानाअखिलेश यादव के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित होता है…या फिर एक बड़ा सियासी जोखिम।ये तो वक्त बताएगा पर ये फैसला अखिलेश यादव का डर जाहिर कर रहा है।

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