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राखी के धागे से बंधा रिश्ता, जरूरत पड़ी तो थाम ली जिंदगी की डोर..

न्यूज डेस्क, लखनऊ

लखनऊ। राखी का धागा सिर्फ भाई की कलाई पर नहीं बंधता, यह प्यार, भरोसे और साथ का वादा भी होता है। लेकिन जब जिंदगी ने परीक्षा ली तो दो बहनों ने इस रिश्ते को एक नई मिसाल दे दी। भाई की किडनी खराब होने पर दोनों बहनें आगे आईं और अपनी किडनी दान कर भाइयों को नई जिंदगी देने का फैसला किया। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लखनऊ में हुए इन दोनों किडनी ट्रांसप्लांट ने भाई-बहन के रिश्ते की गहराई को सामने रखा।

भाई के लिए बहन बनीं किडनी डोनर

वाराणसी के सिंधोरा थाना क्षेत्र के ग्राम बुंची निवासी कौशिक कुमार मिश्रा की किडनी खराब हो गई थी। ट्रांसप्लांट ही उनके इलाज का रास्ता था। परिवार के लिए यह बेहद मुश्किल समय था। ऐसे में उनकी बहन अनीता मिश्रा ने अपनी किडनी दान करने का फैसला किया। मार्च 2026 में एसजीपीजीआई, लखनऊ में कौशिक का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ।

अनीता ने कहा, “भाई को बीमारी की हालत में देखकर मन बहुत परेशान था। मेरे मन में सिर्फ यही था कि अगर मेरी किडनी से उसकी जिंदगी बच सकती है तो इससे बड़ा मेरे लिए कुछ नहीं है। आज मेरा भाई स्वस्थ जिंदगी की ओर बढ़ रहा है, इससे बड़ी खुशी मेरे लिए कुछ नहीं।”

अरविंद के लिए ज्ञानती ने किया अंगदान

गाजीपुर निवासी अरविंद कुमार की किडनी खराब होने के बाद परिवार के सामने भी ट्रांसप्लांट की चुनौती थी। इस मुश्किल समय में उनकी बड़ी बहन ज्ञानती आगे आईं और भाई को अपनी किडनी देने का फैसला किया। अक्टूबर 2025 में एसजीपीजीआई, लखनऊ में अरविंद का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ।

एक तरफ भाई की बीमारी ने परिवार को चिंता में डाल दिया था, तो दूसरी ओर ज्ञानती के फैसले ने उनमें उम्मीद जगा दी। उनके अंगदान से अरविंद को नई जिंदगी की ओर बढ़ने का मौका मिला।

राखी से कहीं मजबूत निकला रिश्ता

रक्षाबंधन पर बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन अनीता और ज्ञानती ने इस रिश्ते को एक अलग अर्थ दिया। जिस भाई की रक्षा का वचन आमतौर पर भाई देता है, उसकी जिंदगी बचाने के लिए दोनों बहनें खुद आगे आ गईं।

किडनी खराब होने की खबर से परिवारों में जो डर और चिंता थी, बहनों के फैसले ने उसे उम्मीद में बदल दिया। यह सिर्फ अंगदान नहीं था, बल्कि उस रिश्ते का भरोसा था, जो मुश्किल वक्त में और मजबूत हो गया।

किडनी दान करने वाली बहनों की संख्या कम

प्रो. नारायण प्रसाद और किडनी ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर विजय प्रताप सोनकर के अनुसार, किडनी दान करने वालों में मां और पत्नी की संख्या अधिक रहती है। पिछले पांच वर्षों में बहनों द्वारा किडनी दान करने के मामले करीब नौ से अधिक नहीं रहे हैं।

इसके पीछे सामाजिक सोच, शादी के बाद ससुराल पक्ष की सहमति और अंगदान को लेकर बनी कई भ्रांतियां बड़ी वजह मानी जाती हैं। विजय प्रताप सोनकर के अनुसार, उचित चिकित्सकीय जांच में स्वस्थ पाए जाने के बाद किडनी दान करने वाला व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। इसलिए अंगदान को लेकर डर और भ्रम के बजाय सही चिकित्सकीय जानकारी को महत्व देना जरूरी है।

सिर्फ इलाज नहीं, रिश्ते की भी कहानी

ट्रांसप्लांट टीम के हिमांशु के मुताबिक, किडनी ट्रांसप्लांट केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भावनाओं और रिश्तों से भी जुड़ा फैसला है। जब कोई बहन अपने भाई की जिंदगी बचाने के लिए आगे आती है, तो वह पूरे परिवार के लिए बेहद भावुक पल होता है।

अनीता और ज्ञानती ने सिर्फ अपनी किडनी दान नहीं की, बल्कि अपने भाइयों और परिवारों को फिर से मुस्कुराने की वजह दी। दोनों बहनों ने यह साबित किया कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ राखी के धागे तक सीमित नहीं होता। जरूरत पड़ने पर यही रिश्ता किसी की जिंदगी की डोर भी थाम सकता है।

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