रिपोर्ट: प्रिया बाजपेयी शुक्ला
लखनऊ। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर देशभर में भक्तों में खास उत्साह है। मंदिरों से लेकर घरों तक कान्हा के स्वागत की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की पूजा की जाती है। भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा-अर्चना कर जन्मोत्सव मनाते हैं।
जन्माष्टमी से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं और मान्यताएं हैं, जिनका अलग-अलग क्षेत्रों में पालन किया जाता है। इनमें खीरा काटने की रस्म, छप्पन भोग और कान्हा के प्रिय व्यंजनों का भोग प्रमुख हैं।
जन्म के समय क्यों काटा जाता है खीरा?
कुछ स्थानों पर जन्माष्टमी की पूजा में खीरा काटने की परंपरा निभाई जाती है। इसके लिए ताजा और बिना कटा हुआ खीरा लिया जाता है। उसे अच्छी तरह धोकर पूजा स्थल पर रखा जाता है। मान्यता के अनुसार, खीरे के ऊपरी हिस्से में छोटा-सा कट लगाकर उसमें बाल कृष्ण की छोटी प्रतिमा या लड्डू गोपाल के प्रतीक को रखा जाता है।
निशीथ काल यानी मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय मंत्रोच्चार, भजन और आरती के साथ खीरा काटने की रस्म निभाई जाती है। कई जगह इस परंपरा को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और कारागार में उनके प्राकट्य का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद कान्हा को माखन-मिश्री, फल और अन्य प्रसाद का भोग लगाया जाता है।
छप्पन भोग में क्या-क्या शामिल करें?
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन भोग अर्पित करने की परंपरा भी काफी लोकप्रिय है। मान्यता के अनुसार, भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर भगवान को भोग लगाते हैं।
छप्पन भोग में गाय का घी, मक्खन, मलाई, रबड़ी, लस्सी, पापड़, सीरा, मोहन भोग, मौसमी फल, पान-सुपारी, इलायची, चावल-दाल, कढ़ी, दही, बाटी, पूरी, खीर, लड्डू, मालपुआ, घेवर, जलेबी, रसगुल्ला, मठरी, फेनी, अचार, रायता और साग समेत कई तरह के मीठे, खट्टे, तीखे, कड़वे और कसैले व्यंजन शामिल किए जाते हैं।
निर्जल व्रत रखना जरूरी है?
जन्माष्टमी के व्रत को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराएं देखने को मिलती हैं। कुछ श्रद्धालु इस दिन निर्जल और निराहार व्रत रखते हैं, जबकि कई लोग अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार करते हैं।
जो लोग निर्जल व्रत रखने में सक्षम नहीं हैं, वे फल, दूध या अन्य सात्विक फलाहार लेकर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना कर सकते हैं। धार्मिक आस्था के साथ अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना भी जरूरी माना जाता है।
कान्हा को प्रिय हैं ये 8 व्यंजन
भगवान श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। इसके अलावा जन्माष्टमी पर कई अन्य व्यंजनों का भी भोग लगाया जाता है।
कान्हा के प्रिय माने जाने वाले प्रमुख व्यंजनों में खीर, सूजी का हलवा या लड्डू, सेवइयां, पूरनपोली, मालपुआ, केसर भात, केले सहित विभिन्न मीठे फल और कलाकंद शामिल हैं।
श्रीकृष्ण के जीवन में अंक 8 का क्या महत्व है?
भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में अंक 8 को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। उनका जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था।
पौराणिक मान्यताओं में श्रीकृष्ण को वसुदेव और देवकी की आठवीं संतान बताया गया है। उनकी आठ प्रमुख पटरानियों का भी उल्लेख मिलता है, जिन्हें अष्टभार्या कहा जाता है। इस तरह श्रीकृष्ण के जन्म और जीवन से जुड़े कई प्रसंगों में अंक आठ का उल्लेख मिलता है।
गोपियों के घर ही माखन चुराने क्यों जाते थे कान्हा?
श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की कथा सबसे लोकप्रिय प्रसंगों में से एक है। ब्रज की गोपियां दूध-दही से माखन तैयार करती थीं और बाल कृष्ण के प्रति विशेष स्नेह रखती थीं।
मान्यता है कि कृष्ण जब गोपियों के घर माखन चुराने पहुंचते थे तो वे यशोदा मैया से उनकी शिकायत करती थीं। हालांकि इन शिकायतों के पीछे भी कान्हा के प्रति उनका प्रेम और लगाव छिपा होता था। गोपियों की शिकायतों और कृष्ण की शरारतों ने ब्रज में उनकी बाल लीलाओं को और भी जीवंत बना दिया।
कृष्ण की माखन चोरी की लीला को केवल बाल शरारत नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच प्रेम और आत्मीयता के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
मध्यरात्रि में होगा कान्हा का जन्मोत्सव
जन्माष्टमी की रात भक्त निशीथ काल में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं। मंदिरों और घरों में लड्डू गोपाल को नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। पालने को सजाया जाता है और जन्म के समय शंख-घंटियों के साथ आरती की जाती है।
इसके बाद भगवान को माखन-मिश्री, फल, मिठाई और अन्य पकवानों का भोग लगाया जाता है। भक्त प्रसाद ग्रहण कर जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, प्रेम, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश भी देती है।
