रिपोर्ट – प्रिया बाजपेई शुक्ला
प्रयागराज। सरकारी विभाग में लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारी के पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ को केवल इस आधार पर रोका नहीं जा सकता कि जिस पद पर उसकी नियुक्ति हुई थी, वह बाद में अस्तित्व में नहीं रहा। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया कि कर्मचारी को मिलने वाले पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ उसकी सेवा अवधि के आधार पर तय किए जाने चाहिए।
कोर्ट ने राज्य सरकार को संबंधित कर्मचारी की पेंशन, ग्रेच्युटी समेत सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर 30 दिन के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने पीलीभीत निवासी कनिष्ठ लिपिक बालकृष्ण शर्मा की विशेष अपील स्वीकार करते हुए दिया।
30 साल की सेवा के बाद भी नहीं मिला सेवानिवृत्ति लाभ
मामले में बालकृष्ण शर्मा की ओर से कहा गया कि उन्होंने करीब 30 साल तक विभाग में सेवा की और इस दौरान उनके काम को लेकर कोई शिकायत नहीं थी। इसके बावजूद उन्हें पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित किया जा रहा था।
खंडपीठ ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि कर्मचारी से लंबे समय तक सेवा लेने के बाद केवल नियुक्ति वाले पद की स्थिति का हवाला देकर वैधानिक सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सेवा अवधि को पेंशन और अन्य लाभों की गणना का आधार माना।
1997 में कनिष्ठ लिपिक पद पर हुई थी नियुक्ति
मामले के अनुसार वित्त एवं राजस्व के अपर आयुक्त, बरेली जोन की ओर से कनिष्ठ लिपिक के दो पदों के लिए 11 जुलाई 1997 को विज्ञापन जारी किया गया था। लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद बालकृष्ण शर्मा का नाम 31 जुलाई 1997 की चयन सूची में दूसरे स्थान पर आया था। इसके बाद उन्हें 12 सितंबर 1997 को नियुक्ति पत्र जारी किया गया और उन्होंने पद पर कार्यभार संभाला।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि सामान्य वर्ग के दो पदों में से एक पर विमल सक्सेना की अनुकंपा नियुक्ति 25 जुलाई 1997 को हुई थी, जबकि दूसरा पद चयनित अभ्यर्थी सैयद अकरम अली को दिया गया था। बाद में बालकृष्ण शर्मा की नियुक्ति कर्मचारी प्रतिमा सक्सेना की लीव वैकेंसी पर होने की बात सामने आई।
2000 में सेवा समाप्त होने के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई
कोर्ट को बताया गया कि बालकृष्ण शर्मा की सेवा 13 सितंबर 2000 को समाप्त कर दी गई थी। इसके बाद उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लिया। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया गया।
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी से लगातार काम लिया गया और उसकी सेवा का लाभ लिया गया, तो बाद में सेवा अवधि के आधार पर मिलने वाले वैधानिक लाभों से उसे वंचित करना उचित नहीं होगा।
30 दिन में पेंशन और ग्रेच्युटी का भुगतान करने का निर्देश
खंडपीठ ने एकलपीठ के 31 अगस्त 2012 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें बालकृष्ण शर्मा की याचिका खारिज कर दी गई थी। इसके साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि कर्मचारी की पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर 30 दिन के भीतर भुगतान किया जाए।
इस फैसले में कोर्ट ने सेवानिवृत्ति लाभों को कर्मचारी की सेवा अवधि से जोड़ते हुए विभागीय नियुक्ति के पद की बाद की स्थिति को अकेले लाभों से वंचित करने का आधार मानने से इनकार किया।
