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अयोध्या दीपोत्सव से चमकी कुम्हारों की किस्मत, किसी को एक लाख तो किसी को दो लाख दीयों का ऑर्डर

न्यूज डेस्क, लखनऊ

अयोध्या। रामनगरी अयोध्या का दीपोत्सव अब आस्था और परंपरा के साथ स्थानीय कारीगरों की आजीविका का भी बड़ा सहारा बन रहा है। मिट्टी के दीयों की बढ़ती मांग से कुम्हार परिवारों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। कभी काम की तलाश में दूसरे शहरों का रुख करने वाले युवा अब अपने गांव में रहकर पारंपरिक हुनर के जरिए कमाई कर रहे हैं। दीपोत्सव की तैयारियों ने कुम्हारों के घरों में भी खुशहाली की उम्मीद जगाई है।

एक लाख से दो लाख दीयों तक के ऑर्डर

अयोध्या के जयसिंहपुर गांव में दीपोत्सव को लेकर कुम्हार परिवार बड़े पैमाने पर दीये बनाने में जुटे हैं। गांव के बृज किशोर प्रजापति के मुताबिक, इस बार उन्हें एक लाख दीये तैयार करने का ऑर्डर मिला था, जिसे समय पर पूरा कर पहुंचा दिया गया। वहीं, गांव के राजेश प्रजापति को दो लाख दीये बनाने का ऑर्डर मिला है। उनके परिवार के सभी सदस्य मिलकर इस काम को पूरा करने में लगे हैं।

राजेश प्रजापति बताते हैं कि पहले पूरे महीने में मुश्किल से 20 से 25 हजार रुपये की कमाई हो पाती थी, लेकिन दीपोत्सव के दौरान बड़े ऑर्डर मिलने से लाखों रुपये की आमदनी का अवसर मिल रहा है। इससे परिवारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल रहा है और युवाओं का पारंपरिक पेशे के प्रति भरोसा भी बढ़ रहा है।

इलेक्ट्रिक चाक से बढ़ा उत्पादन

कुम्हार परिवारों को इलेक्ट्रिक चाक उपलब्ध होने से दीये बनाने के काम में तेजी आई है। पारंपरिक हुनर के साथ आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से उत्पादन क्षमता बढ़ी है और कम समय में अधिक दीये तैयार करना आसान हुआ है।

जयसिंहपुर, विद्याकुंड और सोहावल के ड्योढ़ी समेत कई इलाकों में कारीगर दिन-रात दीपोत्सव की तैयारियों में जुटे हैं। कहीं मिट्टी गूंथी जा रही है तो कहीं दीयों को आकार देकर सुखाया जा रहा है। मिट्टी के दीयों की बढ़ती मांग से स्थानीय कारीगरों को बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिल रहा है।

राम की पैड़ी पर 30 लाख दीप जलाने का लक्ष्य

दीपोत्सव के दसवें संस्करण के लिए 7 नवंबर को राम की पैड़ी पर 30 लाख दीप प्रज्ज्वलित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। आयोजन की तैयारियां तेज कर दी गई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, क्वीन हो मेमोरियल पार्क में 17.64 लाख दीये घाट स्थित गोदाम में रखे गए हैं। आयोजन की व्यवस्थाओं में अवध विश्वविद्यालय के छात्र, अधिकारी और स्वयंसेवी संगठन जुटे हैं। इसके लिए करीब 35 हजार स्वयंसेवकों को लगाया गया है।

दीपोत्सव की भव्यता के साथ स्थानीय कारीगरों की मेहनत को भी नई पहचान मिल रही है। बड़े ऑर्डर, मिट्टी के दीयों की मांग और आधुनिक उपकरणों ने कुम्हार परिवारों के पारंपरिक हुनर को बाजार से जोड़ने का काम किया है। रामनगरी के घाटों पर जगमगाते दीपों के साथ उन परिवारों के घरों में भी उम्मीद की रोशनी पहुंच रही है, जिनकी पीढ़ियां मिट्टी के दीये बनाकर भारतीय संस्कृति की इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

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