रिपोर्ट : प्रिया बाजपेयी शुक्ला
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (KGBV) में वर्षों से संविदा पर काम कर रहे शिक्षकों को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार को चार महीने के भीतर शिक्षकों के पद स्वीकृत या सृजित करने और उनकी सेवा शर्तें नियमित शिक्षकों के समान करने का निर्देश दिया है। साथ ही अंतरिम व्यवस्था के तहत सभी केजीबीवी शिक्षकों को 17 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय देने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने अर्चना बूथ एवं अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने कहा कि शिक्षकों को वर्षों तक संविदा पर रखकर बिना पद सृजित किए और नियमित शिक्षकों के समान वेतन दिए बिना काम कराना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत निषिद्ध जबरन श्रम की श्रेणी में आता है।
17 हजार रुपये प्रतिमाह मिलेगा मानदेय
हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षकों को दिया जा रहा मानदेय अर्द्धकुशल श्रमिकों के निर्धारित पारिश्रमिक से भी कम है। अदालत ने इसे मानदेय के नाम पर क्रूर मजाक बताया। निर्देश दिया कि जब तक सरकार पद सृजन और सेवा शर्तों को लेकर आवश्यक कदम नहीं उठाती, तब तक सभी केजीबीवी शिक्षकों को निर्णय की तारीख से 17 हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाएं।
प्रदेश के सभी KGBV शिक्षकों को मिलेगा लाभ
अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश का लाभ केवल याचिकाकर्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश के सभी कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के शिक्षकों पर लागू होगा। कोर्ट ने शिक्षकों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 24(2) के तहत सेवा संबंधी संरक्षण देने की भी बात कही है।
सरकार को शिक्षकों की सेवा शर्तें तय करनी होंगी, जो इंटरमीडिएट स्तर तक के नियमित शिक्षकों के समान होंगी। साथ ही उनकी शैक्षिक योग्यता और सेवा अवधि के आधार पर नियमितीकरण के दावों पर कानून के अनुसार विचार करना होगा।
केंद्र से बजट न मिलने का बहाना नहीं चलेगा
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार को योजना के तहत सहमति के अनुसार अपना वित्तीय हिस्सा देना होगा। राज्य सरकार केंद्र से धनराशि स्वीकृत नहीं होने का हवाला देकर आदेश के पालन से इनकार नहीं कर सकती। इसके लिए राज्य सरकार ‘पहले भुगतान, फिर वसूली’ के सिद्धांत पर केंद्र से अपना हिस्सा प्राप्त कर सकती है।
गौरतलब है कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना वर्ष 2004 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य वंचित और पिछड़े समुदायों की बालिकाओं को आवासीय और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है।
