प्रदेश में हृदय रोगियों के इलाज को लेकर राहत भरी तस्वीर सामने आई है। कार्डियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया (CSI) के यूपी चैप्टर की रिपोर्ट के अनुसार, दिल के 60 प्रतिशत से अधिक मरीजों को आयुष्मान भारत योजना के तहत मुफ्त इलाज मिल रहा है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लाखों मरीजों को महंगे उपचार से बड़ी राहत मिली है।
योजना के तहत पात्र परिवारों को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध कराया जाता है, जिससे निजी और सरकारी अस्पतालों में गंभीर बीमारियों—जैसे हृदय रोग, कैंसर, किडनी और लिवर से जुड़े मामलों का उपचार संभव हो पाया है।
दिल के मरीजों को मिला नया जीवन
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी अस्पतालों की जवाबदेही और पारदर्शिता को और मजबूत किया जाए, तो यह योजना और अधिक प्रभावी हो सकती है। इसके अलावा करीब 15 प्रतिशत मरीजों का इलाज पंडित दीन दयाल उपाध्याय योजना, मुख्यमंत्री राहत कोष समेत अन्य सरकारी योजनाओं से किया गया है।
संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SGPGI) के कार्डियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. आदित्य कपूर के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में प्रदेश में इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी केंद्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
राज्य में मौजूद 226 कैथ लैब में 316 कार्डियोलॉजिस्ट द्वारा एक साल में औसतन 60 हजार से अधिक एंजियोप्लास्टी की गईं, जिनमें करीब 90 हजार स्टेंट लगाए गए। वहीं, आयुष्मान योजना के तहत ही लगभग 8 हजार मरीजों को पेसमेकर भी लगाए गए हैं।
लखनऊ बना इलाज का प्रमुख केंद्र
प्रदेश में सबसे अधिक 32 कैथ लैब लखनऊ में हैं। यहां अकेले 27 हजार मरीजों की एंजियोप्लास्टी हुई, जिसमें 40 हजार स्टेंट लगाए गए। आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान और लारी कार्डियोलॉजी संस्थान में सबसे अधिक लाभ मिल रहा है।
पहले जहां मरीजों को एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था, अब उन्हें समय पर इलाज उपलब्ध हो रहा है।
देश में चौथे स्थान पर यूपी
विशेषज्ञों के अनुसार, देश में इंटरवेंशनल केंद्रों की संख्या के मामले में उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात के बाद यूपी का स्थान आता है। अब प्रदेश के अधिकांश मंडलों में कैथ लैब की सुविधा उपलब्ध है और शेष जिलों में भी इसे स्थापित करने की योजना पर काम चल रहा है।
बढ़ रहे दिल के मरीज, बदल रही उम्र की सीमा
डॉक्टरों के मुताबिक, अब दिल की बीमारी केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई है। 30-40 वर्ष की आयु वर्ग में भी हार्ट अटैक के मामलों में वृद्धि हुई है। खराब खानपान, शारीरिक निष्क्रियता, मधुमेह, हाई ब्लड प्रेशर और नशे की आदत इसके प्रमुख कारण हैं। पिछले पांच वर्षों में हृदय रोगियों की संख्या में लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
सरकारी योजनाओं का योगदान (आंकड़े):
- आयुष्मान भारत योजना – 60%
- पं. दीन दयाल उपाध्याय योजना – 15%
- CGHS – 10%
- अन्य योजनाएं – 15%
