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कांवड़ यात्रा में आस्था के साथ अनुशासन भी जरूरी, योगी सरकार ने व्यवस्थाओं को दी नई दिशा: आचार्य डॉ. विक्रमादित्य

श्रावण मास में होने वाली कांवड़ यात्रा को लेकर पीतांबरा पीठाधीश एवं विवेकानंद प्रतिष्ठान के अध्यक्ष आचार्य डॉ. विक्रमादित्य ने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल जलाभिषेक की परंपरा नहीं, बल्कि तप, संयम और समर्पण का प्रतीक है। कांधे पर गंगाजल लेकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करने वाले कांवड़िए आस्था और आत्मानुशासन की मिसाल पेश करते हैं।

उन्होंने कहा कि इतनी विशाल धार्मिक यात्रा को सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने के लिए प्रशासनिक दृढ़ता के साथ श्रद्धालुओं की भावनाओं को समझना भी जरूरी है। उनके अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले वर्षों में कांवड़ यात्रा के दौरान सुरक्षा, सुविधा और अनुशासन पर विशेष ध्यान दिया है।

आचार्य डॉ. विक्रमादित्य ने कहा कि मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि हर जिले में कांवड़ियों के लिए व्यवस्थाएं बेहतर हों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सम्मान व सुविधा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। कांवड़ यात्रा के दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर अवध, बुंदेलखंड, ब्रज, रुहेलखंड और पूर्वांचल तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु यात्रा करते हैं। ऐसे में पूरे प्रदेश में समान स्तर की व्यवस्थाएं सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान मार्गों को सुचारु रखने, क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, स्वच्छता, पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाओं पर भी सरकार का जोर है। इसके अलावा चिकित्सा शिविरों को प्रभावी बनाने और आवश्यक दवाओं के साथ एंटी वेनम व एंटी रैबीज इंजेक्शन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

आचार्य ने कहा कि कांवड़ यात्रा मार्ग पर मांस और मदिरा की दुकानों को बंद रखने, दुकानों पर संचालक का नाम स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने और डीजे की आवाज निर्धारित मानकों के अनुरूप रखने जैसे निर्देश श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं और यात्रा की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए दिए गए हैं।

उन्होंने कहा कि यात्रा के दौरान अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं पर भी प्रशासन को सतर्क रहने की जरूरत है। फर्जी खबरों का तत्काल खंडन करने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई के साथ ही कांवड़ संघों और स्थानीय प्रशासन के बीच लगातार संवाद भी जरूरी है।

आचार्य डॉ. विक्रमादित्य के अनुसार, आस्था और अनुशासन का संतुलन ही कांवड़ यात्रा को सुरक्षित और गरिमापूर्ण बनाता है। जब प्रशासन और समाज मिलकर श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए काम करते हैं, तो धार्मिक आयोजन केवल आस्था का विषय नहीं रहता, बल्कि सामाजिक समरसता और सामूहिक चेतना का भी प्रतीक बन जाता है।

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