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PM मोदी ने प्रकृति संरक्षण को बताया मानव कल्याण का आधार, साझा किया सुभाषितम्

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को प्रकृति के संरक्षण और उसके सम्मान को मानवता के कल्याण से जोड़ते हुए एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण की भावना केवल पर्यावरण बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन और समाज के समग्र कल्याण का भी आधार है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की प्राचीन परंपरा हमेशा से मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन और सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देती रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “प्रकृति के संरक्षण और सम्मान में ही मानवता का कल्याण निहित है। हमारी परंपरा भी हमें इसी धर्मसम्मत आचरण की प्रेरणा देती है।”

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश के साथ संस्कृत का यह सुभाषितम् साझा किया—

“लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा।
ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥
दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा।
श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥”

इस सुभाषितम् में व्यक्ति के जीवन में प्रकृति, समय और धर्म के साथ सामंजस्य की कामना की गई है। इसका भाव यह है कि दिशाओं के सभी रक्षक देवता और इंद्र सहित देवगण, वर्ष की छहों ऋतुएं, सभी महीने, दिन, रात और शुभ मुहूर्त व्यक्ति के जीवन में सदैव मंगल और कल्याण लेकर आएं। साथ ही श्रुति, स्मृति और धर्म हर परिस्थिति में व्यक्ति की रक्षा करें।

प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन पर जोर

प्रधानमंत्री के संदेश का मूल भाव प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने की भारतीय परंपरा से जुड़ा है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के अभिन्न हिस्से के तौर पर देखा गया है। नदियों, पर्वतों, वनों, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान की परंपरा भारतीय जीवनशैली में सदियों से रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले भी पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास के महत्व पर जोर देते रहे हैं। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर भी उन्होंने प्रकृति संरक्षण को भारत की संस्कृति और संस्कारों का अभिन्न हिस्सा बताया था तथा ‘मिशन लाइफ’ और ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसी पहलों के जरिए पर्यावरण के प्रति जनभागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया था।

प्राचीन ज्ञान में छिपा है पर्यावरण संरक्षण का संदेश

साझा किए गए सुभाषितम् में प्रकृति, समय और धर्म के बीच संतुलन की जो भावना व्यक्त की गई है, वह भारतीय दर्शन की उस सोच को दर्शाती है जिसमें मानव कल्याण को प्रकृति के कल्याण से अलग नहीं माना गया। ऋतुओं, महीनों, दिनों और शुभ मुहूर्तों का उल्लेख जीवन में समय और प्राकृतिक चक्रों के महत्व को रेखांकित करता है।

प्रधानमंत्री के इस संदेश को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी, पर्यावरण संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने की दिशा में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को सामने रखने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। उनका संदेश यह बताता है कि प्रकृति का संरक्षण केवल वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के प्रति भी हमारा दायित्व है।

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