गोरखपुर से रेफर होकर लखनऊ पहुंचे देवरिया के एक गंभीर मरीज की बुधवार को वेंटिलेटर न मिलने से मौत हो गई। परिजन अस्पताल-दर-अस्पताल भटकते रहे, लेकिन समय पर सुविधा नहीं मिल सकी।
राजधानी के सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर होने के बावजूद मैनपावर और विशेषज्ञों की कमी के चलते कई मशीनें बंद पड़ी हैं। लोकबंधु और बलरामपुर अस्पताल समेत कई जगहों पर आधे से ज्यादा वेंटिलेटर उपयोग में नहीं हैं।
पीजीआई और केजीएमयू जैसे बड़े संस्थानों में भी मरीजों का दबाव ज्यादा होने से वेंटिलेटर आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते। विशेषज्ञों का कहना है कि संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन की लापरवाही ऐसी घटनाओं की वजह बन रही है।
सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर पर इलाज मुफ्त होता है, जबकि बड़े संस्थानों में इसका खर्च प्रतिदिन 10 से 20 हजार रुपये तक आता है। निजी अस्पतालों में यही खर्च एक से डेढ़ लाख रुपये प्रतिदिन तक पहुंच जाता है, जो आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब संसाधन मौजूद हैं, तो उनका सही उपयोग क्यों नहीं हो रहा। समय-समय पर खबरें सामने आने और कार्रवाई के आश्वासन के बावजूद जमीनी स्थिति में सुधार न होना चिंता का विषय बना
