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अधिक मास में तुलसी पूजा का विशेष महत्व, जानिए सही विधि और जरूरी नियम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 17 मई से ज्येष्ठ अधिक मास की शुरुआत हो चुकी है। इस पवित्र माह को पुरुषोत्तम माह भी कहा जाता है, जो भगवान विष्णु की आराधना के लिए बेहद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान विधि-विधान से तुलसी पूजा करने पर भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

हिंदू धर्म में तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना गया है। ऐसे में अधिक मास में तुलसी पूजन, दीपदान और परिक्रमा का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक विश्वास है कि इस माह में की गई तुलसी पूजा सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

अधिक मास में तुलसी पूजा की विधि

अधिक मास में प्रतिदिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद तांबे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल लें और उसमें गंगाजल व थोड़ा कच्चा दूध मिलाएं। फिर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करते हुए तुलसी के पौधे में जल अर्पित करें।

जल चढ़ाने के बाद तुलसी माता को हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक लगाएं। साथ ही पीले फूल, चुनरी और सुहाग की सामग्री अर्पित करें। शाम के समय तुलसी के पास घी का दीपक जलाकर आरती करें और कम से कम 3, 5 या 11 बार परिक्रमा करें। ध्यान रखें कि दीपक सीधे जमीन पर न रखें, उसके नीचे अक्षत या फूलों की पंखुड़ियां अवश्य रखें।

तुलसी पूजा के दौरान रखें इन बातों का ध्यान

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रविवार, एकादशी और द्वादशी के दिन तुलसी में जल अर्पित नहीं करना चाहिए। इन दिनों तुलसी के पत्ते तोड़ना भी वर्जित माना गया है। इसके अलावा सूर्यास्त के बाद भी तुलसी दल नहीं तोड़ना चाहिए।

तुलसी के पौधे के आसपास साफ-सफाई बनाए रखना बेहद जरूरी माना गया है। पौधे के पास जूते-चप्पल, झाड़ू या कूड़ेदान जैसी चीजें नहीं रखनी चाहिए। साथ ही हमेशा शुद्ध और ताजा जल ही अर्पित करें तथा गंदे या जूठे हाथों से तुलसी को स्पर्श करने से बचें।

Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और लोक आस्थाओं पर आधारित है। इसकी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं की गई है।

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