लखनऊ। उत्तर प्रदेश की पारंपरिक थाली, जिसमें दाल, चावल, रोटी और सब्जी शामिल होती है, अब मधुमेह (डायबिटीज) के मरीजों के लिए चिंता का कारण बनती जा रही है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और अन्य संस्थानों की हालिया स्टडी ने उत्तर प्रदेश के खानपान को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भोजन में दाल और हरी सब्जियों की मात्रा कम तथा चावल और रोटी की मात्रा अधिक रहेगी, तो डायबिटीज को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
रिसर्च में क्या सामने आया?
ICMR-INDIAB स्टडी के मुताबिक देश में डायबिटीज की कुल प्रसार दर करीब 11.4 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 4.8 से 4.9 प्रतिशत के आसपास है। हालांकि, प्रीडायबिटीज के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, जो शहरी ही नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी चिंता का विषय बन चुकी है।
अध्ययन के अनुसार, उत्तर प्रदेश के पारंपरिक भोजन में सफेद चावल, गेहूं की रोटियां और आलू की सब्जी प्रमुख रूप से शामिल हैं। इसमें रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की मात्रा 60 प्रतिशत से अधिक होती है। ICMR और अन्य अध्ययनों के अनुसार भारतीय थाली में लगभग 62 प्रतिशत कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से आती है, जबकि प्रोटीन की मात्रा केवल 12 प्रतिशत के आसपास होती है। ऐसे में केवल चीनी या मिठाई छोड़ना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
‘यूपी की थाली में 75% तक कार्बोहाइड्रेट’
डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) के मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर डॉ. ऋतु करौली के अनुसार, उत्तर प्रदेश की पारंपरिक थाली में लगभग 75 प्रतिशत तक कार्बोहाइड्रेट होता है, जो डायबिटीज मरीजों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति चीनी और मिठाई छोड़ भी दे, तब भी केवल उससे विशेष लाभ नहीं मिलेगा। भोजन को संतुलित करना आवश्यक है। इसके लिए चिकित्सकीय सलाह लेकर हरी सब्जियों और दाल की मात्रा बढ़ानी चाहिए, ताकि शरीर को पर्याप्त प्रोटीन मिल सके।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी बढ़ रहा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण उत्तर प्रदेश में बदलती जीवनशैली भी डायबिटीज का खतरा बढ़ा रही है। खेती-किसानी में शारीरिक मेहनत कम होने, मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल, जंक फूड, मीठे पेय पदार्थों और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण अब यह बीमारी गांवों तक तेजी से पहुंच रही है।
ICMR के आंकड़ों के अनुसार, कई कम विकसित राज्यों में डायबिटीज और प्रीडायबिटीज का अनुपात 1:1 से कम है, जिससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
मरीज का अनुभव
बख्शी का तालाब की रहने वाली लोक निर्माण विभाग की कर्मचारी सताक्षी सिंह ने बताया कि करीब एक वर्ष पहले उन्हें लगातार कमजोरी महसूस होने लगी थी। इसके बाद उन्होंने मेडिसिन विभाग में इलाज कराया। अब उनकी स्थिति बेहतर है और उन्हें सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से नियमित दवाएं मिल रही हैं।
क्या करें?
विशेषज्ञों के अनुसार, पहले डायबिटीज को केवल शहरी और संपन्न लोगों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब बाराबंकी, उन्नाव, सीतापुर सहित कई जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह तेजी से फैल रही है। इसकी बड़ी वजह बदलती जीवनशैली और जागरूकता की कमी है।
डॉक्टरों की सलाह है कि चावल पकाने के बाद उसका अतिरिक्त स्टार्च निकालकर सेवन करें और गेहूं की जगह मिलेट्स (मोटे अनाज) की रोटियों को भोजन में शामिल करें।

प्रोटीन बढ़ाना है जरूरी
डॉ. ऋतु करौली का कहना है कि भोजन में कार्बोहाइड्रेट कम कर प्लांट-बेस्ड प्रोटीन जैसे दालें, पनीर और दही की मात्रा बढ़ाना जरूरी है। उन्होंने बताया कि RMLIMS की ओपीडी में 30 से 40 वर्ष आयु वर्ग के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मेटफॉर्मिन जैसी दवाएं केवल लक्षणों को नियंत्रित करती हैं, लेकिन यदि खानपान में बदलाव नहीं किया गया तो शुगर नियंत्रित करना कठिन होगा।
डायबिटीज के प्रमुख लक्षण
- अचानक वजन कम होना
- बार-बार पेशाब आना
- अधिक प्यास लगना
- लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना
विशेषज्ञों के अनुसार, इन लक्षणों के दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
देर से पता चलना भी बड़ी चुनौती
डॉ. ऋतु करौली के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में लगभग 40 प्रतिशत मरीजों को यह पता ही नहीं चलता कि वे प्रीडायबिटीज या डायबिटीज से पीड़ित हैं। जब तक वे बड़े अस्पतालों या RMLIMS पहुंचते हैं, तब तक किडनी, आंखों या पैरों पर बीमारी का असर शुरू हो चुका होता है।
समाधान क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे पहले खानपान और जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा लगभग 5 प्रतिशत कम और प्लांट या डेयरी आधारित प्रोटीन की मात्रा 5 प्रतिशत बढ़ाने से डायबिटीज का खतरा कम किया जा सकता है।
साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित स्क्रीनिंग कैंप, संतुलित आहार के प्रति जागरूकता और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी को देखते हुए डायबिटीज का बढ़ता प्रसार भविष्य में स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
