उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की रामनगर तहसील से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित लोधेश्वर महादेव धाम उत्तर भारत के प्रमुख पौराणिक शिव तीर्थों में गिना जाता है। यहां हर वर्ष महाशिवरात्रि, श्रावण मास, हरितालिका तीज और अगहन मेले के दौरान लाखों श्रद्धालु दर्शन, पूजन, जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा के लिए पहुंचते हैं। पहले मंदिर और मेलों की व्यवस्थाएं मठ एवं पुजारियों तक सीमित थीं, लेकिन पिछले करीब दो दशकों से प्रशासन भी व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर लोधेश्वर कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा के बाद यहां सुविधाओं का लगातार विस्तार किया जा रहा है।
महाभारत और रामायण काल से जुड़ी है मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लोधेश्वर महादेव का शिवलिंग स्वयंभू है और इसे पृथ्वी पर स्थित 52 स्वयंभू शिवलिंगों में विशेष स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि सतयुग में भगवान विष्णु ने वाराह अवतार के बाद भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिव गंडकी (वर्तमान सरयू-घाघरा) तट पर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने इस शिवलिंग का नाम गंडकेश्वर रखा।
भगवान राम के पुत्र लव ने किया था पूजन
त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के सशरीर प्रस्थान के बाद उनके पुत्र लव महर्षि वशिष्ठ के निर्देश पर वाराह क्षेत्र पहुंचे और स्वयंभू शिवलिंग की खोज कर विधिवत पूजा-अर्चना की। मान्यता है कि तभी इस शिवलिंग का नाम ‘लवेश्वर’ पड़ा और भगवान शिव ने भक्तों के कल्याण का आशीर्वाद दिया।
महाभारत काल में भी रहा विशेष महत्व
द्वापरयुग में पांडवों ने भी इस क्षेत्र में भगवान शिव की आराधना की थी। मान्यता है कि माता कुंती ने किंतूर में कुंतेश्वर महादेव की स्थापना की, जबकि अर्जुन स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लाकर बरौलिया में स्थापित किए। यह भी कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले धर्मराज युधिष्ठिर ने यहां विशाल यज्ञ किया था और अर्जुन के बाण से निकली जलधारा आज बोहनिया तालाब के नाम से प्रसिद्ध है। कांवड़ यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु आज भी इसी पवित्र सरोवर में स्नान कर भगवान लोधेश्वर के दर्शन के लिए जाते हैं।
लोधेराम अवस्थी के स्वप्न में प्रकट हुए भगवान शिव
पौराणिक कथा के अनुसार समय के साथ स्वयंभू शिवलिंग भूमि में दब गया था। कलयुग में लोधौरा गांव के लोधेराम अवस्थी खेत की सिंचाई कर रहे थे, तभी खुदाई के दौरान शिवलिंग प्रकट हुआ। उसी रात भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर पूजा-अर्चना का निर्देश दिया। इसके बाद वहां नियमित पूजा शुरू हुई और भगवान शिव ने आशीर्वाद दिया कि कलयुग में यह धाम ‘लोधेश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध होगा।
मठ परंपरा आज भी कायम
लोधेश्वर धाम की मठ परंपरा आज भी जारी है। भगवान शिव के निर्देश पर लोधेराम अवस्थी ने मंदिर की व्यवस्था संन्यासी सवाई सहदेव पुरी को सौंपी, जो पहले महंत बने। इसके बाद कई महंतों ने गद्दी संभाली। वर्तमान में उत्तराधिकार का मामला न्यायालय में विचाराधीन है, जबकि पुरी संप्रदाय के संन्यासी मंदिर की परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं।
सालभर लगते हैं चार प्रमुख मेले
लोधेश्वर महादेव धाम में महाशिवरात्रि, श्रावण मास, हरितालिका तीज और अगहन के अवसर पर चार प्रमुख धार्मिक मेलों का आयोजन होता है। सावन में दूर-दूर से कांवड़िए गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हुए भगवान लोधेश्वर का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। सामान्य दिनों में भी प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।
कॉरिडोर से मिलेगा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा
मंदिर के पुजारी आदित्य तिवारी के अनुसार सावन, महाशिवरात्रि, कजरी तीज और अगहन मेले में श्रद्धालुओं की संख्या लाखों तक पहुंच जाती है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश चौरसिया का मानना है कि कॉरिडोर बनने के बाद लोधेश्वर महादेव धाम की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी। इससे श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलने के साथ धार्मिक पर्यटन को भी नई गति मिलेगी।
