अलीगंज के सेक्टर-डी स्थित जिस भवन में सोमवार को भीषण आग लगी, उससे जुड़े पुराने रिकॉर्ड अब कई सवाल खड़े कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार, इस भवन में अवैध निर्माण को लेकर वर्ष 2016 में ध्वस्तीकरण (तोड़ने) का आदेश जारी किया गया था, लेकिन दो महीने से भी कम समय में वह आदेश निरस्त कर दिया गया था।

1980 में हुआ था भवन का आवंटन
भवन संख्या एमएस/102/डी का आवंटन 11 जुलाई 1980 को विजय कुमार के नाम लॉटरी के जरिए किया गया था। बाद में 2005 में यह भवन विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुआ। इसके बाद 19 जनवरी 2013 को भवन को वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला को बेच दिया गया।
लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने 7 अगस्त 2014 को नए मालिकों के नाम भवन का नामांतरण किया। करीब 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाले इस भवन का नक्शा 20 अगस्त 2014 को आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था।
अवैध निर्माण पर हुई थी कार्रवाई
एलडीए को बाद में भवन में अनधिकृत निर्माण की जानकारी मिली। इसके बाद वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ वर्ष 2016 में मामला दर्ज किया गया। जांच के बाद 10 मई 2016 को विहित प्राधिकारी ने अवैध निर्माण के खिलाफ ध्वस्तीकरण का आदेश जारी कर दिया।

दो महीने में ही पलट गया फैसला
सबसे बड़ा सवाल यह है कि ध्वस्तीकरण का आदेश जारी होने के करीब दो महीने बाद, 5 जुलाई 2016 को उसे निरस्त कर दिया गया। अब अलीगंज अग्निकांड के बाद इस पुराने फैसले और भवन में हुए निर्माण को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। प्रशासन और संबंधित विभागों की भूमिका भी चर्चा में है।
आग के बाद जांच तेज
सोमवार को हुई भीषण आग में कई लोगों की जान चली गई, जबकि कई लोग घायल हुए हैं। घटना के बाद प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है और भवन से जुड़े पुराने दस्तावेजों की भी पड़ताल की जा रही है।
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