नई दिल्ली। आस्था, संस्कृति और लोकविश्वास से जुड़ी कहानियां इन दिनों सिनेमा में दर्शकों का ध्यान खींच रही हैं। संत नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ के बाद अब उत्तराखंड की लोकगाथा पर आधारित फिल्म ‘बाला गोरिया’ बड़े पर्दे पर आने जा रही है। यह फिल्म कुमाऊं के न्याय के देवता माने जाने वाले गोलू देवता की लोकगाथा पर आधारित है। फिल्म 16 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।
राजा के बेटे की कहानी से शुरू होती है गाथा
फिल्म की कहानी उत्तराखंड के चंपावत की पहाड़ियों से शुरू होती है। इसमें बाला गोरिया को राजा झाल राय और रानी कालिंका के पुत्र के रूप में दिखाया गया है। कहानी के अनुसार, बचपन से ही बाला साहसी और न्यायप्रिय होता है। वह अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है और कमजोर लोगों के पक्ष में खड़ा होता है।
बाला की बढ़ती लोकप्रियता दरबार में मौजूद लोगों और उसके सौतेले भाइयों को पसंद नहीं आती। इसके बाद उसके खिलाफ साजिशों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
साजिश में फंसाकर दी जाती है मौत की सजा
फिल्म की कहानी के मुताबिक, बाला को उसके करीबियों की साजिश के चलते झूठे आरोप में फंसा दिया जाता है। इसके बाद उसे मौत की सजा सुनाई जाती है। कहानी में बाला बदला लेने के बजाय अपने भाग्य को स्वीकार करता है और अपने बलिदान का रास्ता चुनता है।
उसकी मृत्यु के बाद इलाके में कई ऐसी घटनाएं होने लगती हैं, जिन्हें लोग उसके दिव्य अस्तित्व से जोड़ने लगते हैं। यहीं से एक राजकुमार की कहानी धीरे-धीरे गोलू देवता की लोकआस्था में बदल जाती है।
न्याय के देवता के रूप में होती है पूजा
उत्तराखंड में गोलू देवता को न्याय का देवता माना जाता है। चंपावत, घोड़ाखाल और चितई समेत कई स्थानों पर उनके मंदिर लोकआस्था के प्रमुख केंद्र हैं। मान्यता है कि भक्त अपनी समस्याओं और फरियादों को लिखकर मंदिर में अर्पित करते हैं और न्याय की प्रार्थना करते हैं।
‘बाला गोरिया’ में सत्य, न्याय, बलिदान और आस्था को कहानी का केंद्र बनाया गया है। फिल्म के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह एक राजकुमार के बलिदान की कथा समय के साथ लोकविश्वास और आस्था का हिस्सा बन गई।
