मेरठ। सावन की कांवड़ यात्रा इस वर्ष केवल शिवभक्ति का ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी सशक्त संदेश दे रही है। हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रहे कांवड़िए अपनी कांवड़ों को बांस, जूट, कृत्रिम पौधों और अन्य प्राकृतिक सामग्री से सजाकर हरित जीवन और प्लास्टिक मुक्त समाज का संदेश दे रहे हैं।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर भगवान शिव, मां पार्वती, महाकाल और हनुमान की आकर्षक झांकियों के साथ पर्यावरण संरक्षण की थीम पर तैयार कांवड़ श्रद्धालुओं का ध्यान खींच रही हैं। बड़ी संख्या में शिवभक्त प्लास्टिक की जगह स्टील के पात्र, कपड़े, बांस और जूट का उपयोग कर रहे हैं, जिससे स्वच्छ और टिकाऊ कांवड़ यात्रा को बढ़ावा मिल रहा है।

हरिद्वार से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख शिवालयों तक पर्यावरण संरक्षण की कई पहलें देखने को मिल रही हैं। बागपत के प्रसिद्ध पुरा महादेव मंदिर में इस बार चढ़ाए जाने वाले फूलों और पत्तियों का अलग-अलग संग्रह किया जाएगा।
फूलों से अगरबत्ती बनाई जाएगी, जबकि फल और पत्तियां गौशालाओं को भेजी जाएंगी। यह पहल धार्मिक अवशेषों के पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के अनुसार, कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि जल, जंगल और जमीन के सम्मान का प्रतीक है। उनका कहना है कि यदि इस यात्रा को पौधारोपण, जल संरक्षण और प्लास्टिक मुक्त जीवन जैसे अभियानों से जोड़ा जाए, तो यह दुनिया का सबसे बड़ा जनभागीदारी आधारित पर्यावरण जागरूकता अभियान बन सकता है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि प्रत्येक कांवड़िया एक पौधा लगाने, जल बचाने और प्लास्टिक का उपयोग न करने का संकल्प ले। उनका मानना है कि आस्था और प्रकृति का यह संगम आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और हरित भविष्य की मजबूत नींव रख सकता है।
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